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अविरत मजबूरी

Title: अविरत मजबूरी

गयाकवाड़ा नाम के शहर में छोटी सी एक शख्सियत नेहा रहती थी। वह घर से बाहर नहीं निकल सकती थी क्योंकि उसके पास बीमारी के कारण पैरों में संभावित था। वह एक बहुत ही खुशहाल जिंदगी जीती है अपने घरवालों के ही बीच में घर में ही रहकर।

नेहा के घरवालें उससे बहुत प्यार करते थे। वे हर तरह से उसकी देखभाल करते थे। उन्होंने उसे पढ़ाई-लिखाई में समर्थ बनाने के लिए एक शिक्षक भी रखा। नेहा अपनी पढ़ाई के बीच में खुश वक्त बिताती थी। वह हिस्सेदारी पूरी करने के बावजूद बैठी रहती थी। उसे गुरु के वचन से बहुत मोहब्बत थी तभी एक दिन उसके गुरु ने उससे पूछा। “नेहा! तुम्हारी आंखों में कितनी रौशनी है?”

नंदिनी जी ने उसकी देखभाल के लिए आए दिन गुरु को देखा तो वह मुस्कुराई। उसे अचानक अपनी अविरत मजबूरी का यह एहसास हुआ कि वह आखिरी सांस लेने से पहले कुछ अधिकार का धनी बनाने का इच्छुक है।

यह उसे अपने अंतिम स्फुरण की इच्छा दे देती थी, इसी तरह उसने अपनी अविरत मजबूरी को रोककर समझना शुरू किया। नंदिनी जी ने उसे बताया कि एक दिन वह अपने पैरों से खड़ी हो जाएगी और उसे सशक्त बनाने के लिए वह प्रतियोगिताओं में भाग ले सकती है। वह स्वयं को स्वस्थ रखे बिना भी गर्व से महसूस कर सकती है। अंततः, उसने नंदिनी जी की बात से इतना प्रेरित होते हुए एक बैठक संचालित की जिसमें उसने अपने भाई, बहन और नातीजों से प्रतियोगिता करने के लिए उम्मीदवारी की अनुमति मांगी। सब ने उससे प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए सहमति दी।

वह दो माह में अपनी तैयारी शुरू करने लगी। वह अपने शख्सियत पर काबू पाने के लिए डॉक्टर की सलाह भी लेती थी। वह स्वस्थ जीवन जीने की संभावना समझती थी और उसे एक सशक्त होने के लिए ख्याल करती थी। वह अब पैरों में संभावित नहीं धड़धड़ाती थी।

प्रतियोगिता में सभी नेहा जैसे को कुछ हाथ नहीं आया। वह जीत नहीं सकी लेकिन थमकीदार तरीके से उसने खुशनुमा रहने का अनुभव किया था। इस प्रतियोगिता ने उसके अंदर संगीत, नृत्य, खुशी और उत्साह जागृत किया था।

उसने रियासत के प्रतियोगिताओं में भी भाग लिया। वह इतनी महानता जीत नहीं पाई थी, लेकिन अब उसे अपने जीवन और दूसरों के जीवन पर अपना प्रभाव पूरी तरह से समझ में आ गया था। उसे महत्वपूर्ण लगता था कि उसकी जिंदगी में क्या होगा और वह अपने क्षेत्र मे दूसरों की मदद कर पाउंगी। इसके बाद उसका जीवन बदला। वह समाज सेवा में लग गई। उसे अपनी आंखों की रौशनी और उत्साह दूसरों के जीवन में लाने में समर्पित करने का इच्छा हो गया था।

नेहा ने बहुत संघर्ष के बाद जीवन को अपने अंदर की अंधेरी दुनिया से दूर करके जीत अर्जित की। इससे उसमें नई सोच का जन्म हुआ कि एक इंसान को तैयार रखने के लिए उसे मजबूरी के बावजूद प्रोत्साहित और प्राथमिक शिक्षा प्रदान की अवश्यकता है। उसने खुद को छोटी सी महिला समूह के प्रौद्योगिकी नियंत्रण में शामिल कर जो बिना फंसाए गए होते हैं।

वह एक हमदर्दी और उम्मीद केंद्रित संगठन बनाने की योजना बनाकर अन्य महिलाओं के सहयोग से अपर्याप्त वित्तीय संसाधनों पर चलती हुई थी। उसका लक्ष्य वह समूह था जो पैसे या कोई अन्य संसाधन प्रदान किए बिना खुशहाली के जीवन जीता हो।

नेहा के इस प्रयास ने एक समाज में महिलाओं के ऊपर की अवरोधकता को दूर करते हुए समाज को सुधार कर हार्दिक आश्वसन दिया।

नेहा अपने जीवन में कोई हद नहीं लेती है। वह अपने जीवन के अंतिम फलक में भी एक शांत, प्रतियोगिता और सत्य के साथ जाना चाहती है। उसने जीवन के अंदर से जो अविरत मजबूरी से जूझ रही थी वह आखिरकार उसके ऊपर संतुष्टि का सबक सिखा। संघर्ष से जो उसकी स्थिति चलती रही थी अब उसे स्थिरता मिलती रही।

कागा जी

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