**कहानी का शीर्षक: समय की धरोहर** बनारस की एक तंग लेकिन

**कहानी का शीर्षक: समय की धरोहर**

बनारस की एक तंग लेकिन जीवंत गली के नुक्कड़ पर ‘समय संसार’ नाम की एक छोटी सी दुकान थी। इस दुकान की दीवारों पर तरह-तरह की घड़ियाँ टंगी थीं—दीवार घड़ियाँ, पेंडुलम वाली घड़ियाँ, कलाई घड़ियाँ और कुछ प्राचीन जेब घड़ियाँ (पॉकेट वॉचेस)। जब सारी घड़ियाँ एक साथ टिक-टिक करती थीं, तो ऐसा लगता था मानो दुकान में समय का अपना एक संगीत गूंज रहा हो।

इस दुकान के मालिक थे सत्तर वर्षीय हरीश बाबू। हरीश बाबू के लिए घड़ियाँ केवल समय बताने वाले यंत्र नहीं थे, बल्कि वे उन्हें जीवित पात्र मानते थे। उनका मानना था कि हर घड़ी के पास अपनी एक कहानी होती है। उनकी इस कला और विरासत को संभालने वाला परिवार में कोई नहीं था, सिवाय उनके पोते आरव के।

आरव दिल्ली में रहकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। वह आधुनिक विचारों वाला, कंप्यूटर और तकनीक की दुनिया में जीने वाला युवक था। उसके लिए समय का मतलब मोबाइल की स्क्रीन पर चमकते डिजिटल अंक थे। जब वह छुट्टियों में बनारस आया, तो उसे अपने दादाजी का इस छोटी सी दुकान में बैठकर पुरानी घड़ियों के पुर्जे साफ करना बेहद उबाऊ और पुराना लगा।

एक दोपहर, आरव दुकान पर बैठा लैपटॉप पर काम कर रहा था। हरीश बाबू एक बहुत पुरानी, सोने की परत वाली जेब घड़ी को ध्यान से देख रहे थे।

आरव ने चिढ़कर कहा, “दादाजी, आप इस धूल-मिट्टी और बेकार की घड़ियों में अपना समय क्यों बर्बाद करते हैं? आजकल तो लोग स्मार्टवॉच पहनते हैं जो धड़कन भी नापती है। आपकी इस दुकान को बंद करके हमें दिल्ली चल जाना चाहिए। वहाँ आराम की जिंदगी है।”

हरीश बाबू ने चश्मा नाक पर थोड़ा नीचे खिसकाया, प्यार से मुस्कुराए और बोले, “आरव बेटा, तुम्हारी स्मार्टवॉच समय तो बता सकती है, लेकिन समय के साथ बीते लम्हों को समेट नहीं सकती। यह जो जेब घड़ी तुम देख रहे हो न, यह केवल धातु का टुकड़ा नहीं है। इसे 1942 में स्वतंत्रता सेनानी बाबू रघुनाथ ने अपनी पत्नी को तोहफे में दिया था। इसमें आज भी उस दौर की धड़कनें सुरक्षित हैं। मशीनें बदली जा सकती हैं आरव, यादें और इतिहास नहीं।”

आरव ने कंधे उचका दिए। उसे दादाजी की बातें किसी दार्शनिक की बकवास जैसी लगीं।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। अगले ही हफ्ते, अचानक हरीश बाबू की तबीयत बिगड़ गई। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। डॉक्टरों ने उन्हें पूरी तरह आराम करने की सलाह दी और किसी भी तरह के मानसिक या शारीरिक तनाव से दूर रहने को कहा। दुकान बंद हो गई।

एक शाम, जब आरव दुकान से कुछ जरूरी कागजात लेने गया, तो उसने देखा कि दुकान के बाहर एक बुजुर्ग सज्जन बड़े उदास चेहरे के साथ खड़े थे। उनके हाथ में एक मखमली डिब्बी थी।

आरव को देखकर उनके चेहरे पर उम्मीद की किरण जागी। उन्होंने कहा, “बेटा, क्या हरीश बाबू अंदर हैं? मेरी इस घड़ी की कमानी टूट गई है। अगले हफ्ते मेरी पोती की शादी है और मैं उसे यही घड़ी उपहार में देना चाहता हूँ। यह मेरी दिवंगत पत्नी की आखिरी निशानी है। हरीश बाबू ने वादा किया था कि वे इसे ठीक कर देंगे।”

आरव ने असमंजस में कहा, “दादाजी की तबीयत ठीक नहीं है, वे दुकान पर नहीं आ सकते।”

बुजुर्ग की आँखें डबडबा गईं। उन्होंने कहा, “यह सिर्फ घड़ी नहीं है बेटा, मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा है। अगर यह ठीक नहीं हुई, तो मुझे लगेगा कि मेरी पत्नी का आशीर्वाद मेरी पोती तक नहीं पहुँच पाया।”

बुजुर्ग की बातें सुनकर आरव के दिल में कुछ हलचल हुई। उसे दादाजी की बात याद आई—”घड़ियाँ यादें सहेजती हैं।” उसने बुजुर्ग से कहा, “बाबा, आप यह घड़ी मुझे दे दीजिए। मैं कोशिश करूँगा।”

बुजुर्ग ने कांपते हाथों से घड़ी आरव को सौंप दी।

उस रात, आरव दुकान के पिछले हिस्से में बनी छोटी सी वर्कशॉप में बैठा। चारों तरफ सन्नाटा था, सिर्फ घड़ियों की टिक-टिक सुनाई दे रही थी। उसने टेबल लैंप जलाया, दादाजी का आवर्धक लेंस (आई-लूप) अपनी आँख पर लगाया और घड़ी को खोला।

घड़ी के भीतर का तंत्र बेहद जटिल था। सूक्ष्म चक्र (गेयर्स), बारीक कमानी (स्प्रिंग्स) और नन्हे पेंच। आरव को अहसास हुआ कि यह काम उसकी कंप्यूटर कोडिंग से कहीं अधिक धैर्य और एकाग्रता की मांग करता है। एक छोटी सी गलती और सौ साल पुरानी यह धरोहर हमेशा के लिए शांत हो सकती थी।

आरव ने दादाजी की पुरानी डायरी निकाली, जिसमें वे घड़ियों के जटिल मैकेनिज्म के बारे में चित्र बनाकर लिखते थे। पूरी रात आरव जागा रहा। उसकी उंगलियां दर्द कर रही थीं, आँखें थक चुकी थीं, लेकिन उसके भीतर एक अजीब सा जुनून सवार था। वह उस बुजुर्ग के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहता था, और अनजाने में ही सही, अपने दादाजी की विरासत का मान रखना चाहता था।

भोर की पहली किरण जब दुकान की खिड़की से अंदर आई, तब आरव ने उस घड़ी के अंतिम पेंच को कसा। उसने घड़ी की चाबी घुमाई।

कमरे के सन्नाटे में एक हल्की सी आवाज गूंजी—”टिक… टिक… टिक…।”

आरव के चेहरे पर एक ऐसी खुशी और संतोष की मुस्कान थी जो उसने अपनी बड़ी से बड़ी कोडिंग प्रतियोगिता जीतकर भी महसूस नहीं की थी। वह घड़ी धड़क उठी थी। वह समय की नदी में दोबारा बहने लगी थी।

दो दिन बाद, वह बुजुर्ग दुकान पर आए। जब आरव ने उन्हें चलती हुई घड़ी सौंपी, तो बुजुर्ग की आँखों से खुशी के आंसू बह निकले। उन्होंने आरव के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया, “जीते रहो बेटा! तुमने आज सिर्फ घड़ी नहीं ठीक की, मेरी यादों को अमर कर दिया। तुम बिल्कुल अपने दादाजी जैसे गुणी हो।”

उसी शाम, जब हरीश बाबू अस्पताल से घर लौटे, तो आरव ने उन्हें पूरी बात बताई। हरीश बाबू ने आरव के हाथों को देखा, जिन पर तेल और घड़ियों के बारीक पुर्जों के निशान थे।

हरीश बाबू की आँखों में गर्व के आंसू थे। उन्होंने आरव को गले से लगा लिया और कहा, “आज मुझे विश्वास हो गया कि मेरे जाने के बाद भी ‘समय संसार’ थमेगा नहीं।”

आरव ने मुस्कुराते हुए कहा, “दादाजी, मैं दिल्ली वापस नहीं जा रहा हूँ। मैं अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद यहीं आऊंगा। हम मिलकर इस दुकान को एक नया रूप देंगे। मैं आपकी इस पारंपरिक कारीगरी को इंटरनेट के जरिए पूरी दुनिया तक ले जाऊंगा। आधुनिक तकनीक और पुरानी यादें मिलकर इस ‘समय की धरोहर’ को हमेशा जिंदा रखेंगी।”

बनारस की उस शाम, गंगा की आरती की घंटियों के बीच, ‘समय संसार’ की घड़ियों की टिक-टिक में एक नई लय, एक नया संगीत शामिल हो चुका था—विरासत और आधुनिकता के खूबसूरत मिलन का संगीत।

कागा जी