मित्रों, लोकतंत्र में सबसे बड़ी त्रासदी क्या है? गरीबी? बेरोजगारी? जी नहीं! सबसे बड़ी त्रासदी है एक महान और ओजस्वी नेता के पास रैली में कोसने के लिए ‘दुश्मनों’ का अकाल पड़ जाना। ‘द प्रिंट’ की हालिया रिपोर्ट ने देश के इस सबसे गंभीर संकट की ओर इशारा किया है। रिपोर्ट कहती है कि आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी अब खुद ‘सिस्टम’ (एस्टेब्लिशमेंट) बन चुके हैं, वह अब ‘आउटसाइडर’ नहीं रहे। अब सोचिए, उस बेचारे भाषण लेखक के दिल पर क्या गुजर रही होगी, जिसे रोज सुबह उठकर साहेब के लिए एक नया विलेन ढूंढना पड़ता है!
शुरुआती दिनों में जिंदगी कितनी हसीन और आसान थी। एक तरफ ‘लुटियंस दिल्ली का भ्रष्ट तंत्र’ था और दूसरी तरफ गुजरात से आया एक ‘फकीर’। जनता ने इस लड़ाई को देखा और भावुक होकर झोलियां भर-भर के वोट दे दिए। लेकिन अब? अब तो नया संसद भवन भी अपना है, आलीशान प्रधानमंत्री आवास भी अपना है, और पूरा तंत्र भी उंगलियों के इशारे पर कत्थक करता है। अब भला यह रोना कैसे रोया जाए कि “दिल्ली का इकोसिस्टम मुझे काम नहीं करने दे रहा”?
नेहरू जी भी थक गए, अब नया विलेन कहां से लाएं?
पिछले दस सालों में हमारे भाषण लेखकों ने ‘दुश्मनों’ की लिस्ट को इतनी बेरहमी से निचोड़ा है कि अब वे पूरी तरह घिस चुकी हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वर्ग में बैठकर चाय पीते हुए सोच रहे होंगे कि भाई, सत्तर साल पहले की मेरी गलतियों का बिल आज भी मेरे ही पते पर क्यों फट रहा है? पाकिस्तान का नाम लेकर जनता को डराना अब उतना थ्रिलिंग नहीं रहा, क्योंकि उनके पास खुद चाय-आटा खरीदने के पैसे नहीं बचे हैं। उधर कांग्रेस को एक तरफ ‘कमजोर और खत्म’ भी बताना है और दूसरी तरफ उसे देश के लिए ‘सबसे बड़ा खतरा’ भी साबित करना है—इस विरोधाभास को संभालते-संभालते आईटी सेल वालों के सिर के बाल उड़ चुके हैं।
अब तो रही-सही कसर नीतीश बाबू और नायडू जी ने पूरी कर दी, जो बगल की कुर्सी पर फेविकोल की तरह चिपके मुस्कुरा रहे हैं। ऐसे में विपक्ष को ‘भ्रष्टाचारी’ और ‘परिवारवादी’ कहना भी अब वैसा मज़ा नहीं देता, क्योंकि आधे से ज्यादा ‘दागी’ तो अब वाशिंग मशीन से धुलकर सत्ता पक्ष की बेंचों पर ही चमक रहे हैं।
‘काक-वाणी’ का सुझाव है कि अब समय आ गया है जब सरकार को ‘दुश्मन आयात मंत्रालय’ का गठन कर देना चाहिए। जब तक नया दुश्मन नहीं मिलेगा, तब तक रैलियों में वह पुराना जोश कैसे आएगा? अगर धरती पर दुश्मन कम पड़ गए हैं, तो अब भाषणों में सीधे एलियंस (परग्रहियों) या ब्लैक होल को देश की तरक्की में बाधक घोषित कर देना चाहिए। कम से कम वे पलटकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तो नहीं करेंगे!
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