गाली-शास्त्र: भारतीय राजनीति का नया ‘सभ्य’ व्याकरण

वह दिन गए जब नेताजी मंच पर आकर देश के विकास, जीडीपी और बेरोजगारी पर उबाऊ भाषण दिया करते थे। जनता भी बेचारी ताली बजाते-बजाते सो जाती थी। लेकिन अब, हमारे दूरदर्शी राजनेताओं ने राजनीति को एक नया ‘साहित्यिक रस’ प्रदान किया है। इसे अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ ने भले ही “अपशब्दों की वापसी” कहा हो, पर ‘काक-वाणी’ इसे लोकतंत्र का नया ‘मधुर संगीत’ मानती है। आखिर भाषा का विकास भी तो जरूरी है!

गाली नहीं, यह तो चुनावी ‘अलंकार’ है!

आजकल के दौर में अगर कोई नेता मंच से मर्यादा, सभ्यता और शिष्टाचार की बात करे, तो जनता उसे ‘कमजोर’ समझकर खारिज कर देती है। अब चुनावी रैलियों में जब तक किसी प्रतिद्वंद्वी को कोई तीखी ‘उपाधि’ न दी जाए, तब तक भाषण का रंग ही नहीं जमता। अपशब्द अब गाली नहीं रहे, वे तो नेताओं के कंठ के ‘अलंकार’ बन चुके हैं। जो नेता जितना उत्कृष्ट और रचनात्मक अपशब्द बोल सकता है, उसका कद पार्टी में उतना ही ऊंचा हो जाता है। रात के नौ बजे टीवी डिबेट में जब तक दो-चार प्रवक्ता एक-दूसरे के खानदान का इतिहास न खंगाल लें, तब तक दर्शकों को खाना हजम नहीं होता। यह नया भाषाई व्याकरण वास्तव में हमारी एकता और अखंडता को एक नए ‘शोर’ में पिरो रहा है।

चुनाव आयोग भी बेचारा परेशान है। वह आचार संहिता का डंडा लेकर घूमता रहता है, लेकिन नेताओं की जुबान पर लगाम लगाना उसके बस की बात नहीं। वैसे भी, जब देश की जनता को विकास और रोजगार जैसे जटिल मुद्दों से ज्यादा मजा इस ‘नूरा-कुश्ती’ को देखने में आता हो, तो भला नेता क्यों पीछे रहें? वे तो बस जनभावनाओं का आदर करते हुए वही परोस रहे हैं, जिसकी मांग है।

शब्दकोश का नया ‘विकास मॉडल’

संसद से लेकर सड़क तक, मर्यादा की परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। पहले नेता कहते थे, “हम विकास करेंगे।” अब कहते हैं, “हम उसकी औकात दिखा देंगे।” इस नई राजनीतिक भाषा का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके लिए किसी विशेष योग्यता या बौद्धिक क्षमता की जरूरत नहीं होती। हमारे नवोदित युवा नेताओं को अब अर्थशास्त्र या समाजशास्त्र पढ़ने की कोई जरूरत नहीं है, वे बस सुबह उठकर अपशब्दों के नए पर्यायवाची शब्द याद करते हैं।

खैर, ‘काक-वाणी’ का तो यही मानना है कि यदि यही रफ्तार रही, तो आने वाले समय में चुनावी घोषणापत्रों में मुफ्त बिजली-पानी के बजाय इस बात की गारंटी दी जाएगी कि सत्ता में आने पर विपक्ष को किस स्तर की गालियां दी जाएंगी। तब तक के लिए, आप भी कान में रुई डालिए और इस नए ‘लोकतांत्रिक संगीत’ का आनंद लीजिए!


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कागा जी