बधाई हो मित्रों, बधाई हो! आखिरकार वह शुभ घड़ी आ ही गई, जिसका इंतजार सदियों से भारत की १३५ करोड़ (या अब शायद १४० करोड़) जनता कर रही थी। ऑल इंडिया रेडियो ने ढोल-नगाड़े बजाकर घोषणा की है कि हमारे परम श्रद्धेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लोकतांत्रिक रूप से चुने गए शासनाध्यक्ष (हेड ऑफ गवर्नमेंट) बन गए हैं। अब नेहरू जी और इंदिरा जी के इतिहास-पन्नों को दीमक चाट सकती है, क्योंकि नया और चमकीला रिकॉर्ड दर्ज हो चुका है।
एक भी छुट्टी न लेने का ‘ऐतिहासिक’ फल
इस रिकॉर्ड की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसमें गुजरात के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री के कार्यकाल को फेवीकोल की तरह जोड़ दिया गया है। ‘काक-वाणी’ के परम ज्ञानी विश्लेषकों का मानना है कि यह सब उस ‘बिना छुट्टी लिए २४ घंटे काम करने’ वाली तपस्या का फल है। जबकि साधारण इंसान वीकेंड पर नेटफ्लिक्स देखने के बहाने ढूंढता है, हमारे प्रधान सेवक ने चुनावी रैलियों और कैमरा एंगल के बीच ऐसा दिव्य संतुलन बनाया कि आज इतिहास खुद उनके कदमों में नतमस्तक है। विपक्ष तो अभी तक यही समझने में ही व्यस्त है कि चुनाव आखिर लड़े कैसे जाते हैं, और यहाँ मोदी जी ने ‘लंबी रेस का सिकंदर’ होने का असली मतलब समझा दिया है।
कैमरे की नजर और इतिहास का सफर
इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर देश के मुख्यधारा के गोदी मीडिया चैनलों के दफ्तरों में दिवाली जैसा माहौल है। एंकरों के गले ख़ुशी के मारे रुंध गए हैं। आखिर अब उन्हें बेरोजगारी, महंगाई या मणिपुर जैसे उबाऊ मुद्दों पर सिर खपाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अब अगले एक महीने तक स्क्रीन पर केवल मोदी जी की ‘अथक और निष्काम यात्रा’ के ग्राफिक्स चलेंगे। वैसे, यह सोचना भी कितना सुखद है कि गुजरात की गलियों से शुरू हुआ यह सफर, आज दिल्ली के आलीशान ७, लोक कल्याण मार्ग तक बिना किसी स्पीड ब्रेकर के पहुंच गया। इसमें थोड़ा श्रेय उन निष्पक्ष ईवीएम मशीनों को भी जाता है, जो हर चुनाव के बाद विपक्ष के रोने का मुख्य सहारा बनती हैं।
लोकतंत्र की सबसे सुरक्षित ‘कुर्सी’
अंत में, ‘काक-वाणी’ की तरफ से इस महान कीर्तिमान पर कोटि-कोटि नमन। हमें पूरा विश्वास है कि आने वाले दशकों में यह रिकॉर्ड इतना लंबा हो जाएगा कि गिनीज बुक वाले भी दर्ज करते-करते थक जाएंगे। बस ईश्वर से यही प्रार्थना है कि कैमरे का फोकस और टेलीप्रॉम्प्टर का टेक्स्ट कभी धुंधला न पड़े, क्योंकि जब तक ये सलामत हैं, तब तक हमारा लोकतंत्र भी ‘सुरक्षित हाथों’ में रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाता रहेगा।
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