एक दौर था जब बॉलीवुड के हसीन ख्वाब कश्मीर की बर्फीली वादियों में ही मुकम्मल होते थे। शम्मी कपूर का डल झील में जोर से चिल्लाना ‘याहू!’ हो या राजेश खन्ना का पहाड़ों के बीच गुनगुनाना, कश्मीर के बिना हिंदी सिनेमा की कल्पना भी अधूरी थी। लेकिन फिर वक्त बदला, और जन्नत कहे जाने वाले इस खूबसूरत सूबे की फिजाओं में उग्रवाद का ऐसा जहर घुला कि थिएटर्स पर ताले लटक गए और कैमरों की गूंज अचानक शांत हो गई। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की हालिया रिपोर्ट ने कश्मीर और सिनेमा के इसी दर्दभरे रिश्ते की दास्तां को एक बार फिर ताजा कर दिया है।
जब बंद हो गए सिनेमा हॉल और थम गए कैमरे
90 के दशक की शुरुआत कश्मीर के लिए किसी काले साये की तरह आई। उग्रवाद (militancy) के बढ़ते कदमों ने कश्मीरियों से न सिर्फ उनकी शांति छीनी, बल्कि उनके मनोरंजन का सबसे बड़ा जरिया यानी सिनेमा भी छीन लिया। श्रीनगर का आलीशान ‘रीगल’, ‘पल्लाडियम’ और ‘नीलम’ जैसे टॉकीज, जहां कभी टिकट खिड़की पर दर्शकों की लंबी कतारें लगती थीं, अचानक वीरान हो गए। आतंकी संगठनों के फरमान और लगातार मिलती धमकियों के बाद सिनेमाघरों के मालिकों को मजबूरन अपने दरवाजे बंद करने पड़े। जो जगह कभी दर्शकों की तालियों और सीटियों से गूंजती थी, वहां सिर्फ सन्नाटा और बारूद की गंध रह गई।
शर्मिला टैगोर से लेकर शाहरुख़ तक: सूना पड़ा रहा वादियों का आंगन
कभी ‘कश्मीर की कली’ और ‘जंगली’ जैसी सदाबहार फिल्मों से गुलजार रहने वाली ये वादियां अचानक फिल्मकारों के लिए ‘नो-गो जोन’ बन गईं। बॉलीवुड के बड़े-बड़े डायरेक्टर्स ने कश्मीर के डर से स्विट्जरलैंड और यूरोप की वादियों का रुख कर लिया। हालांकि, कश्मीर जैसी बात कहीं और कहां! सालों तक बड़े पर्दे से कश्मीर गायब रहा।
लेकिन दोस्तों, वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता। ‘काक-वाणी’ के पाठकों के लिए अच्छी खबर यह है कि अब कश्मीर की घाटियों में बदलाव की नई बयार बह रही है। थिएटर्स फिर से खुल रहे हैं, और कश्मीरी युवा एक बार फिर बड़े पर्दे पर मैजिक देखने के लिए तैयार हैं। उम्मीद है कि जल्द ही कश्मीर की हसीन वादियों में फिर से ‘लाइट, कैमरा और एक्शन’ का वही पुराना शोर सुनाई देगा!
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