तिग्मांशु धूलिया की ‘चिंता’ पर काक-वाणी का तीखा वार: क्या सच में बदल गया है बॉलीवुड का मिजाज?

बॉलीवुड में जब भी कोई गंभीर निर्देशक अपनी जुबान खोलता है, तो गलियारों में हलचल मचनी तय होती है। इस बार चर्चा के केंद्र में हैं ‘हासिल’ और ‘पान सिंह तोमर’ जैसी कल्ट फिल्में देने वाले दिग्गज फिल्ममेकर Tigmanshu Dhulia। तिग्मांशु जी ने हाल ही में बॉलीवुड में बढ़ते ‘एंटी-मुस्लिम नैरेटिव’ पर गहरी चिंता जताई है। उनका मानना है कि सिनेमा में एक खास समुदाय को हाशिए पर धकेला जा रहा है। लेकिन ठहरिए! क्या इस सिक्के का केवल एक ही पहलू है? चलिए, ‘काक-वाणी’ के बेबाक चश्मे से इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू यानी ‘काउंटरव्यू’ देखते हैं।

तिग्मांशु धूलिया की चिंता और बॉक्स ऑफिस का असली सच

तिग्मांशु धूलिया का यह सोचना कलात्मक रूप से सही हो सकता है कि फिल्मों का स्तर सुधरना चाहिए, लेकिन पूरे बॉलीवुड को एक ही लाठी से हांकना शायद जल्दबाजी होगी। सिनेमा समाज का आईना तो है ही, लेकिन सबसे बढ़कर यह एक ‘बिजनेस’ है। आज यदि कुछ ऐतिहासिक या देशभक्ति से ओत-प्रोत फिल्में बन रही हैं, तो वह दर्शकों की मांग और बॉक्स ऑफिस के गणित का हिस्सा हैं, न कि कोई सोचा-समझा एजेंडा। फिल्ममेकर्स वही परोसते हैं जिसे जनता थियेटर में टिकट खरीदकर देखना चाहती है।

शाहरुख-सलमान का जलवा: नैरेटिव की हवा निकालने वाले आंकड़े

अगर बॉलीवुड में वाकई कोई ‘एंटी-मुस्लिम नैरेटिव’ हावी होता, तो पिछले साल के आंकड़े कुछ और ही बयां करते। साल 2023 में बॉक्स ऑफिस को मंदी से उबारने वाले असली सिकंदर शाहरुख खान थे। ‘पठान’ और ‘जवान’ जैसी फिल्मों ने न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी कमाई के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। वहीं ‘टाइगर 3’ में सलमान खान का किरदार देश के लिए जान न्योछावर करने वाला जांबाज है। इन फिल्मों को दर्शकों ने जो बेशुमार प्यार दिया, वह इस बात का सबूत है कि भारतीय दर्शक आज भी केवल बेहतरीन मनोरंजन और सुपरस्टार्स के दीवाने हैं, न कि किसी नैरेटिव के।

क्या दर्शक सच में समझदार हो चुके हैं?

आज का दर्शक सोशल मीडिया के युग में जी रहा है। वह प्रोपेगैंडा और असली कला के बीच के बारीक अंतर को बखूबी समझता है। यदि कोई फिल्म केवल एजेंडे के दम पर बनाई जाती है, तो दर्शक उसे सिरे से नकार देते हैं। सिनेमा का असली रिमोट कंट्रोल हमेशा जनता जनार्दन के हाथ में ही रहता है।

बॉलीवुड का दिल आज भी बड़ा है!

बॉलीवुड की गंगा-जमुनी तहजीब को इतनी आसानी से खत्म नहीं किया जा सकता। यहाँ आज भी ए.आर. रहमान के संगीत के बिना शामें अधूरी हैं और गुलजार साहब के अल्फाज दिलों को छूते हैं। कुछ चुनिंदा फिल्मों के आधार पर पूरी इंडस्ट्री पर ठप्पा लगा देना बेमानी होगा। इसलिए तिग्मांशु जी, आपकी चिंता का सम्मान है, लेकिन बॉलीवुड में आज भी केवल एक ही धर्म सबसे बड़ा है—और वह है ‘मनोरंजन’!


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कागा जी