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अंतरंग शांति का मार्ग हमारे जीवन में क्या सबसे ज़्यादा

Title: अंतरंग शांति का मार्ग

हमारे जीवन में क्या सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है? धन? विद्या? सफ़लता? सफलता? ये सभी अत्यधिक महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन क्या हम इन सब चीजों से हमेशा खुश रह सकते हैं? नहीं। इस दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं होता, वहाँ कोई भी चीज आये और जाये सकती है। लेकिन एक चीज जो हमेशा हमारे साथ होती है वो हमारी भावनाएँ और आत्मा होती है।

जीवन यहाँ कुछ भी नहीं है जो हम लेके आ सकते हैं। सब कुछ एक दिन चला जाता है। फिर हम क्यों अपने जीवन में इतना जनलेवा हो जाते हैं? हमें अपनी बात करने के अनेक विषय होते होंगे लेकिन सबसे सबसे हमारी आत्मा और अंतरंग शांति का मार्ग दोनों ही बहुत अनोखा और ख़ास होता है। इसलिए आज इस लेख में हम प्रेरणादायक धार्मिक उद्धरणों के माध्यम से आपको अंतरंग शांति का मार्ग समझाएंगे।

जो अंदर से स्वास्थ है, वो जीता हुआ है
श्री कृष्ण बोले, जो हमारे भीतर से खुशियों और समय समय पर लड़ाईयों जैसे दुखों का सामना करता है, वह व्यक्ति जीता हुआ है। हमें आत्म-संयम का बहुत ही ज़रूरी अहमियत होती है। हमें अपने आंगन में शांति बनाए रखना चाहिए, जो हमें सफलता के पास ले जाती है।

वासुदेव कुटुंबकम्
यह हिंदू धार्मिक स्लोगन एक महत्वपूर्ण धारणा देता है कि सभी लोग हमारे परिवार के हिस्से हैं। इससे हमें परिवार और समुदाय में संबंधों के प्रति जितनी समझ होती है उतनी हमारी आत्मा में भी शांति होती है। हमें सभी लोगों को सम्मान देना चाहिए और उनसे प्रेम करना चाहिए।

अर्थात् केवल उसे तुम्हारी जरुरत है, किसी कारण से, तो उसे स्वयं ही समझते हुए ही तुम उसमें यथार्थता प्रविष्ट होना चाहिए, इस निर्देश से महात्मा गांधी ने जीवन में उच्च शांति महसूस की थी। इससे अर्थ होता है कि हमें अपने हृदय में जो कुछ भी ताकत होती है, सभी के साथ युक्त करना चाहिए और विचारों को स्पष्ट करना चाहिए।

अब तक का सबसे बड़ा कोमल स्पर्श आपका अपना माँ का था, फिर कुछ समझ नहीं आया। फिर अचानक समझ आया। वो सपना था! हंसते हुए मैंने अपनी माँ से अलविदा कह दीजिये, मेरा सपना सच हो गया ना। संत रविदास ने अपनी माँ से विदाई लेते समय जो सपना देखा था उसे वे फिर समझते हुए अंतरंग शांति का अनुभव करते हुए दूसरों से मदद करते रहे। हमें प्रकृति के सभी प्रतिको और वो सब चीजें की भी प्रतिक हैं जो हमने महसूस की हैं, संसंग होना चाहिए।

आपाधिप्तो दृष्टो दृष्टैव दीप्तारक्षो न विद्यते।
अथ भावः स उक्तोऽयं शमयेदेवमक्षयम्।
यह हिंदू श्लोक प्रसिद्ध कबीर जी का है जिसमें वे अंतरंग शांति की बात करते हैं। इसमें कहा जाता है कि जो व्यक्ति अपने अंदर स्वयं की आग को जला लेता है, वह दूसरों के लिए दीपक और उदाहरण बन सकता है। यह हमें अपने आत्मा को जलाने के उपायों के बारे में समझाता है जो हम अन्य लोगों को संगठित करते हैं।

इस लेख के माध्यम से हमने आपको अंतरंग शांति का मार्ग समझाया है। हमने धर्म और उत्कृष्ट व्यक्तित्व के माध्यम से आपको बताया है कि कैसे आप शांति और समाधान के साथ जीवन जी सकते हैं। सम्पूर्ण शांति जो हमारी आत्मा में होती है उसे धार्मिक उपदेशों और समझदारी से मोहित होते हुए ही हम प्राप्त कर सकते हैं।

कागा जी

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