भारत में ज्ञान की सबसे बड़ी और पूरी तरह से मुफ्त यूनिवर्सिटी, यानी ‘WhatsApp University’ ने ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। इस यूनिवर्सिटी के डीन, वीसी और रिसर्च स्कॉलर्स (जो सुबह 5 बजे उठकर चमकीले गुलाब के फूल के साथ ‘गुड मॉर्निंग’ भेजते हैं) ने अब एक नया ‘फैक्ट-चेक’ टूल लॉन्च किया है। इस क्रांतिकारी टूल का नाम है—‘मुझे आया है, तो सच ही होगा।’
नासा और यूनेस्को का ‘सच्चा’ गठबंधन
इस नए फैक्ट-चेक के अनुसार, नासा (NASA) ने एक बार फिर यह प्रमाणित किया है कि भारत के कोने-कोने से उठने वाली ‘फॉरवर्ड’ तरंगों के कारण ब्रह्मांड का संतुलन बना हुआ है। विशेष रूप से जब आप सुबह-सुबह किसी ग्रुप में “यह मैसेज 11 लोगों को भेजें, शाम तक बड़ी खुशखबरी मिलेगी” वाला मैसेज फॉरवर्ड करते हैं, तो नासा के सैटेलाइट्स में लगे सिग्नल्स खुशी से झूम उठते हैं।
वहीं दूसरी तरफ, यूनेस्को (UNESCO) ने भी चुपके से इस हफ्ते के सबसे ‘सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय मैसेज’ का अवॉर्ड उसी पोस्ट को दिया है, जिसमें दावा किया गया था कि रात को तकिए के नीचे लहसुन रखकर सोने से वाई-फाई की स्पीड दोगुनी हो जाती है। अब इस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता, क्योंकि मैसेज के नीचे साफ अक्षरों में ‘सुत्रों के हवाले से’ लिखा हुआ था।
फैक्ट-चेक का अचूक फॉर्मूला: ‘फॉरवर्डेड मैनी टाइम्स’
सोशल मीडिया के इस स्वर्णिम दौर में किसी खबर की सत्यता जांचने के लिए अब बुद्धि या तर्क की आवश्यकता बिल्कुल समाप्त हो चुकी है। नया नियम बहुत सीधा और सरल है—अगर किसी मैसेज के ऊपर ‘Forwarded many times’ का डबल-तीर वाला लेबल लगा है, तो वह खबर सीधे तौर पर परम सत्य मान ली जाएगी।
‘काक-वाणी’ के विशेष सूत्रों के अनुसार, इस यूनिवर्सिटी के छात्र किसी भी वैज्ञानिक रिसर्च को तब तक खारिज करते रहते हैं, जब तक कि उसमें नीचे “इसे इतना शेयर करो कि सरकार हिल जाए” न लिखा हो। जैसे ही यह वाक्य जुड़ता है, खबर में ‘सत्यमेव जयते’ की आत्मा प्रवेश कर जाती है।
डॉक्टरों ने सालों की पढ़ाई के बाद जिस बीमारी का इलाज खोजा, उसे हमारे डिजिटल वैद्यों ने केवल एक चुटकी दालचीनी और गर्म पानी से ठीक कर दिया है। इसलिए, अगली बार जब आपके पास मैसेज आए कि ‘मंगल ग्रह पर पानी की जगह चाय बह रही है’, तो अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करके माहौल खराब न करें। तुरंत उसे अपने 25 ग्रुप्स में भेजें और देश के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान दें। आखिर ज्ञान बांटने से ही तो बढ़ता है, चाहे वह पूरी तरह से काल्पनिक ही क्यों न हो!