जेब में बॉर्डर और दिल में शक: नए भारत की ‘पोर्टेबल’ नागरिकता!

बधाई हो! अब आपको अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए सियाचिन की बर्फीली चोटियों पर जाने की कतई आवश्यकता नहीं है। हमारे परम प्रतापी गृह मंत्रालय ने आपकी सुविधा के लिए बॉर्डर को खुद आपके घर तक पहुँचा दिया है। इसे कहते हैं डिजिटल इंडिया का असली ‘होम डिलीवरी’ अवतार! ‘द इंडिया फोरम’ के हालिया लेख *”Citizens, Suspects, and the Portable Border”* ने हमारी आँखें खोल दी हैं। अब सरहदें भूगोल की किताबों और कटीले तारों तक सीमित नहीं हैं; वे ‘पोर्टेबल’ हो चुकी हैं—इतनी हल्की और लचीली कि सरकार जब चाहे, जिसके भी ड्राइंग रूम में लाकर फिट कर दे।

बॉर्डर अब सीमा पर नहीं, आपके दस्तावेजों में है!

पहले के पिछड़े जमाने में सीमा पर दुश्मन को रोकने के लिए फौज तैनात होती थी। लेकिन आज के ‘अमृत काल’ में, गृह मंत्रालय और नागरिकता के नए समीकरणों के तहत, सीमा आपके राशन कार्ड, आधार कार्ड और व्हाट्सएप चैट में रेंग रही है। इस अभिनव तकनीक के तहत, हर भारतीय नागरिक मूल रूप से एक ‘संभावित घुसपैठिया’ या ‘संदिग्ध’ है, जिसे हर सुबह जीवित रहने के लिए खुद को ‘वैध नागरिक’ साबित करना पड़ता है।

कागज़ात दिखाने का यह खेल इतना रोमांचक है कि लोग अब अपने दादा-परदादा के जन्म प्रमाणपत्र ढूंढने को ही अपना परम राष्ट्रीय कर्त्तव्य मान चुके हैं। धन्य है हमारी प्रशासनिक व्यवस्था, जिसने ‘शंका’ को एक राष्ट्रीय धर्म और ‘सबूत’ को जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना दिया है!

‘पोर्टेबल सरहद’ का जादू: सुबह नागरिक, शाम को संदिग्ध

इस ‘पोर्टेबल बॉर्डर’ की सबसे बड़ी खूबी इसका डायनामिक होना है। आज आप राजधानी के किसी कैफे में बैठकर शांति से चाय पी रहे हैं, और कल अचानक आपके दरवाजे पर एक ‘अदृश्य सीमा’ खड़ी हो जाएगी। आपसे पूछा जाएगा—”साबित करो कि तुम यहीं के हो!”।

अगर आपने सरकार की किसी जनहितैषी नीति पर हल्के से भी अपनी भौहें सिकोड़ीं, तो समझो यह पोर्टेबल बॉर्डर तुरंत आपकी जेब से निकलकर आपकी राष्ट्रीयता को ही निगल जाएगा। विपक्ष चिल्लाता रह गया कि हमारी वास्तविक सीमाओं पर क्या हो रहा है, लेकिन सत्ता के शीर्ष पर बैठे चाणक्य भली-भांति जानते हैं कि असली खतरा बाहर नहीं, बल्कि देश के भीतर उन नागरिकों से है जो ‘सवाल’ पूछने की जुर्रत करते हैं।

‘काक-वाणी’ का स्पष्ट और कर्कश मत है: इस पोर्टेबल बॉर्डर के युग में अपने कागजात संभाल कर रखिए। क्या पता कल को सरकार यह नियम लागू कर दे कि सांस लेने के लिए भी आपको पुरखों का ‘नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) दिखाना होगा। आखिर, इस नए दौर का मूलमंत्र ही यही है—”संदेह ही सुरक्षा है, और हर नागरिक सबसे बड़ा संदिग्ध!”


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कागा जी