Title: दोस्ती का मेला
बचपन की दोस्ती कभी भुलाई नहीं जाती। जो दोस्ती बचपन में होती है वह उम्र बढ़ने पर भी अपनी मिठास नहीं खोती। इसी तरह समीर और राहुल भी अपनी दोस्ती को तरोताजा रखते थे।
समीर और राहुल सर्दी के मौसम में गर्मा गर्म चाय और सामोसे की दुकानों में भीड़ लगाते थे। उन्होंने एक दिन सोचा कि क्यों न एक दोस्ती का मेला संगठित करें। इसमें सभी उम्र के लोग आ सकते हैं और सभी बचपन की यादों से मिलने का मौका मिलता है।
दोस्तों को इसके बारे में बताया गया तो उनमें से हर कोई उत्साहित होगया था। इस मेले को आयोजित करने की तैयारियों ने शुरू कर दी थी।
मेले को संगठित करने के लिए एक फ़रवरी का समय चुना गया था। उस दिन सभी लोग मेले में शामिल होने के लिए उत्सुक थे। धीरे-धीरे मेला भरती गया, सभी कार्यक्रमों को खत्म करने के बाद लोग अपने अपने घर पहुँचने लगे।
दोस्तों की ये एक जुड़वाँ यादगार ग़ज़ल में कहा ही जाता है:
दोस्ती का मेला है,
सब मिल कर मनाएंगे ये मेला।
घुटनों से कभी नहीं जुड़ी,
फुरसतों का एक पेड़ सा है,
जो उसे नहीं जानता,
उसे इसमें से जाना पड़ता है।
दोस्ती का मेला है,
सब मिल कर मनाएंगे ये मेला।
मुस्कुराते चेहरे देखकर,
ऐसा लगता है कि सब जीवन भर दोस्त हैं।
बचपन की पुरानी यादों की आवाज़ है,
जो हमें सदा याद रहती है।
दोस्ती का मेला है,
सब मिल कर मनाएंगे ये मेला।
कहाँ जाकर हम उन अचल समय से मिलते हैं,
जहाँ धूम्रपान नहीं और शराब नहीं होती।
हम उन पुराने समयों में जा पहुँचते हैं,
जहाँ इतनी मायाजाल नहीं होती है।
दोस्ती का मेला है,
सब मिल कर मनाएंगे ये मेला।
इस मेले में शामिल होने से सभी लोग बचपन के दिनों के बारे में सोचते हैं, उन दिनों को याद करते हैं और अपनी जिंदगी की उन पलों का आनंद लेते हैं जो कभी वापस नहीं आ सकते।
दोस्ती का मेला सभी लोगों के बीच मिट्टी का कुछ वक़्त बनता है, जहाँ हम सभी एक साथ मिलकर बचपन और दोस्ती को याद करते हुए एक दूसरे की कमी नहीं महसूस करते। दोस्ती का मेला हमेशा याद रहता है।