वाह! न्यूयॉर्क की हवा में कुछ तो जादुई असर है। जैसे ही हमारे माननीय संघ प्रमुख मोहन भागवत जी का विमान जॉन एफ. कैनेडी एयरपोर्ट पर लैंड करता है, उनके भीतर का ‘उदारवादी वैश्विक नागरिक’ अचानक अंगड़ाई लेकर जाग उठता है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक, न्यूयॉर्क में उन्होंने फरमाया कि हिंदू सोच में मुसलमानों को खारिज करने की कोई जगह नहीं है। ‘काक-वाणी’ इस अद्भुत वैचारिक हृदय-परिवर्तन पर बलैयां लेने को आतुर है। आखिर समंदर पार जाकर ही यह दिव्य ज्ञान क्यों प्राप्त होता है?
वीजा लगते ही जागृत हुआ ‘वसुधैव कुटुंबकम्’
वैसे तो यह ज्ञान स्वदेशी मिट्टी में भी बिखरा पड़ा है, लेकिन न्यूयॉर्क की चमचमाती सड़कों पर विदेशी श्रोताओं के सामने इसे दोहराने का मजा ही कुछ और है। भारत में चाहे जो भी नैरेटिव चल रहा हो, टीवी चैनलों पर चाहे जितनी नफरत की बहसें हो रही हों, लेकिन जैसे ही सात समंदर पार का मंच सजता है, हमारा ‘हिंदू विचार’ इतना समावेशी हो जाता है कि अमेरिकी भी हैरान रह जाएं। वहां जाकर अचानक याद आता है कि बिना मुसलमानों के तो हमारा अस्तित्व ही अधूरा है। काश! यह ‘न्यूयॉर्क वाला चश्मा’ हमारे स्थानीय सोशल मीडिया वीरों को भी मुफ्त में बांट दिया जाता, जो सुबह-शाम बहिष्कार के पोस्टर बनाते रहते हैं।
लोकल में ‘बहिष्कार’, ग्लोबल में ‘सत्कार’
इसे कहते हैं बेहतरीन ‘इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट’ नीति। स्वदेश में चुनावी रैलियों के दौरान जो भाषा ‘कपड़ों से पहचानने’ और ‘घुसपैठियों’ पर आकर टिक जाती है, वह न्यूयॉर्क पहुंचते ही ‘नो एक्सक्लूजन’ के भव्य संदेश में बदल जाती है। काक-वाणी के पाठकों, इस अद्भुत कला को पहचानिए! यह वही कला है जिसमें नागपुर के हेडगेवार भवन से लेकर मैनहट्टन के आलीशान होटलों तक की वैचारिक दूरी को पल भर में तय कर लिया जाता है। घरेलू बाजार के लिए नफरत का तीखा मसाला और विदेशी एक्सपोर्ट के लिए शांति और सद्भाव का मीठा हलवा!
ग्लोबल पीआर और घरेलू यथार्थ
भागवत जी का यह बयान सुनकर अमेरिकी थिंक-टैंक भले ही ताली बजा रहे हों, लेकिन भारत में बैठे दिन-रात नफरत फैलाने वाले टीवी एंकरों के पेट में मरोड़ उठ रही होगी। बेचारे रात-दिन मेहनत करके जिस ‘विभाजन’ का महल खड़ा करते हैं, उसे संघ प्रमुख एक ही झटके में न्यूयॉर्क से गिरा देते हैं। खैर, हमें क्या! हम तो कौवे हैं, कड़वा सच ही बोलेंगे। जब तक विदेशों में ऐसे मंच सजते रहेंगे, हमारी समावेशिता का झंडा न्यूयार्क में लहराता रहेगा। बस दुआ कीजिए कि यह ज्ञान भारत लौटते ही जेट लैग के साथ गायब न हो जाए!
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