वाह! क्या क्रिएटीविटी है! पड़ोसी देश में आग लगी नहीं कि हमारे देश के न्यूज़ स्टूडियोज़ से धुएं के गुबार उठने लगे। एनडीटीवी जैसे ‘गंभीर’ मीडिया घरानों ने अचानक एक नया और भारी-भरकम शब्द खोज निकाला है – ‘बांग्लादेश टेम्प्लेट’। अब हालत यह है कि इस देश में अगर चार लोग सब्जी के दाम बढ़ने पर भी सड़क पर नारे लगा दें, तो प्राइम-टाइम के शूरवीर चीख-चीखकर पूछेंगे, “क्या यह भारत में चुनी हुई सरकार को गिराने की बांग्लादेशी साजिश है?”
स्टूडियो के ‘क्रांतिवीर’ और विदेशी साजिश का डर
‘काक-वाणी’ के प्रिय पाठकों, हमारी राजनीति और मीडिया की सबसे बड़ी खूबी यही है कि इन्हें हर बात में ‘इम्पोर्टेड ड्रामा’ चाहिए। बांग्लादेश में शेख हसीना जी को बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा, तो हमारे विपक्ष के कुछ ‘मुंगेरीलालों’ के चेहरों पर ऐसी चमक आ गई जैसे उन्हें मुफ़्त में सत्ता पाने की ‘गाइडबुक’ मिल गई हो। दूसरी तरफ, सत्ताधारी खेमे के प्रवक्ताओं को हर नुक्कड़ की चाय दुकान पर अमेरिका की सीआईए और जॉर्ज सोरोस के एजेंट समोसे खाते नजर आने लगे हैं।
लोकतंत्र का अपना ‘देसी तड़का’
अरे भाई, थोड़ा सब्र रखिए और ठंडे पानी से मुंह धोइए! हमारे भारत में विरोध प्रदर्शन करने के लिए किसी ‘बांग्लादेशी टेम्प्लेट’ की जरूरत कब से पड़ने लगी? हमारा लोकतंत्र इतना अनोखा है कि यहां हर चुनाव में एक नया टेम्प्लेट बनता है और नतीजे आते ही रीसेट हो जाता है। हमारे देश में धरना-प्रदर्शन के लिए किसी विदेशी साजिश की नहीं, बस एक टेंट, थोड़ा सा लाउडस्पीकर और एक कप गरम चाय की जरूरत होती है।
विपक्ष अगर यह सोचकर खुश हो रहा है कि छात्र सड़कों पर उतरेंगे और रायसीना हिल्स खाली हो जाएगा, तो वे हकीकत से कोसों दूर हैं। और अगर सरकार यह सोचकर पैरानॉयड हो रही है कि हर लोकतांत्रिक विरोध के पीछे देश को अस्थिर करने का अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र है, तो उन्हें अपनी इंटेलिजेंस एजेंसी से पहले अपने टीवी एंकर्स का ब्लड प्रेशर चेक करवाना चाहिए।
निष्कर्ष: कॉपी-पेस्ट राजनीति का अंत
बांग्लादेश की जमीनी हकीकत अलग थी और भारत की अलग है। लेकिन हमारे टीवी चैनलों को तो बस ‘दहशत का बाजार’ गर्म रखना है। भारत का नागरिक अच्छी तरह जानता है कि ईवीएम का बटन दबाकर सरकार कैसे बदली जाती है, उसे बांग्लादेशियों की तरह प्रधानमंत्री आवास में घुसकर सोफे पर सोने का कोई शौक नहीं है। इसलिए, हे स्टूडियो के भविष्यवक्ताओं! यह ‘बांग्लादेशी टेम्प्लेट’ का खौफ बेचना बंद कीजिए। भारत की जनता अपने ड्रामे खुद लिखती है, पड़ोसी का स्क्रिप्ट कॉपी-पेस्ट नहीं करती!
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