विपक्ष की यह हिम्मत? संसद में सवाल पूछकर ‘देश-विरोधी’ बनने का नया ट्रेंड!

मित्रों, ‘काक-वाणी’ के सभी बुद्धिजीवी और मूक पाठकों को प्रणाम। आज देश के प्रधानसेवक ने एक ऐसा गंभीर खुलासा किया है, जिसने हमारे ज्ञान चक्षु पूरी तरह खोल दिए हैं। जी हां, प्रधानमंत्री जी ने बिल्कुल सही पकड़ा है—विपक्ष दरअसल ‘अवरोध की राजनीति’ कर रहा है और इसके पीछे एक बहुत बड़ा ‘एंटी-इंडिया पैटर्न’ काम कर रहा है। हमें तो पहले लगता था कि लोकतंत्र में विपक्ष का काम सवाल पूछना होता है, लेकिन धन्य हो हमारा राजनीतिक ज्ञान, जिसने समझाया कि सरकार से सवाल करना तो सीधे-सीधे देश-विरोधी होना है!

लोकतंत्र की नई परिभाषा: ‘हाँ में हाँ मिलाओ’

अब आप ही सोचिए, इन विपक्षी नेताओं की यह हिम्मत कैसे हुई कि ये संसद में काम-काज रोके? क्या इन्हें नहीं पता कि देश में महंगाई, बेरोजगारी और सीमा विवाद जैसे मुद्दे पूरी तरह से काल्पनिक हैं? जब सरकार कह रही है कि सब ‘चंगा सी’, तो विपक्ष को तो सिर्फ ‘वाह-वाह’ के नारे लगाने चाहिए थे। लेकिन नहीं, ये नादान विपक्षी दल तो संसद में चर्चा कराने की ज़िद पर अड़ जाते हैं। अरे भाई, सवाल पूछना भी कोई देशभक्ति का काम है? सच्चा राष्ट्रभक्त तो वह है जो सरकार के हर फैसले पर बिना सोचे-समझे ढोल-नगाड़े बजाए।

‘अवरोध’ या ‘राष्ट्रवाद’ का नया पैमाना?

प्रधानमंत्री जी ने जिस ‘पैटर्न’ की ओर इशारा किया है, वह वास्तव में बहुत डरावना है। इस पैटर्न के तहत विपक्ष संसद में तख्तियां दिखाता है और बहस की मांग करता है। अब आप खुद ही बताइए, क्या संसद का कीमती समय बहस करने के लिए होता है? बिल्कुल नहीं! संसद तो केवल बिना किसी शोर-शराब के विधेयक पास कराने और मेज थपथपाने की जगह है। अगर विपक्ष जनता के मुद्दों पर जवाब मांगता है, तो स्पष्ट है कि इसके तार पक्का किसी विदेशी साजिश से जुड़े हैं। आखिर भारत को बदनाम करने की इससे बड़ी साजिश और क्या हो सकती है कि दुनिया को पता चल जाए कि हमारे यहाँ सवाल भी पूछे जाते हैं!

‘काक-वाणी’ विपक्ष को एक मुफ़्त की सलाह देना चाहती है। हे मूर्ख विपक्ष! यदि तुम्हें इस देश में टिके रहना है, तो अपनी राजनीति का तरीका बदलो। संसद में बहस की मांग करने के बजाय घर से मंजीरे और ढोलक लेकर जाया करो। जैसे ही सरकार कोई नया बिल लाए, बस कीर्तन शुरू कर दो। यकीन मानिए, उसी दिन आपका यह ‘एंटी-इंडिया पैटर्न’ रातों-रात ‘राष्ट्रभक्ति’ में बदल जाएगा। तब तक के लिए, लोकतंत्र जिंदाबाद… शर्त बस इतनी है कि ताली बजती रहनी चाहिए!


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कागा जी