सोने की सूखी पत्ती और राजा का अहंकार

माया का जाल और राजा चंद्रसेन की चिंता

बहुत समय पहले की बात है, विजयनगर साम्राज्य पर राजा चंद्रसेन का शासन था। राजा के पास धन, दौलत, वैभव और एक विशाल सेना थी। लेकिन इतनी सुख-सुविधाओं के बाद भी राजा के मन में हमेशा एक डर बना रहता था—मृत्यु का डर और अपनी धन-दौलत खोने का भय। वह दिन-रात इसी चिंता में डूबा रहता था कि मरने के बाद उसके इस विशाल खजाने का क्या होगा। वह अपने मंत्रियों से अक्सर पूछता था कि क्या कोई ऐसा तरीका है जिससे वह अपना सारा खजाना अपने साथ परलोक ले जा सके? सभी दरबारी उसकी इस सनक के आगे मौन रह जाते थे।

महात्मा की अनोखी शर्त

एक दिन, राज्य की सीमा पर एक पहुंचे हुए सन्यासी का आगमन हुआ। राजा चंद्रसेन अपनी इसी गहरी चिंता को लेकर उनके पास पहुंचे। राजा ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा, “हे महात्मा! मैं अपनी इस पूरी संपत्ति और साम्राज्य से बहुत प्रेम करता हूँ। मैं इसे खोना नहीं चाहता। क्या कोई ऐसा उपाय है जिससे मैं इसे अपने साथ अगले जन्म या परलोक में ले जा सकूँ?”

महात्मा राजा की नासमझी पर मन ही मन मुस्कुराए। उन्होंने जमीन पर गिरी हुई पीपल की एक सूखी पत्ती उठाई और उसे राजा के हाथ में देते हुए कहा, “राजन, मैं तुम्हें इसका मार्ग बता सकता हूँ। लेकिन मेरी एक छोटी सी शर्त है। यह सूखी पत्ती तुम संभालकर अपने पास रख लो। जब तुम्हारी मृत्यु हो और तुम परलोक पहुँचो, तो वहाँ मुझे यह पत्ती लौटा देना। मैं वहाँ तुम्हारा इंतजार करूँगा।”

ज्ञान की रोशनी और जीवन का सच

राजा महात्मा की बात सुनकर हैरान रह गया। उसने अचरज से कहा, “महात्मा जी, आप कैसी अजीब बात कर रहे हैं? मृत्यु के बाद तो यह शरीर भी यहीं मिट्टी में मिल जाता है। हाथ की उंगली में पहनी अंगूठी तक लोग निकाल लेते हैं। मैं इस बेजान सूखी पत्ती को परलोक भला कैसे ले जा सकता हूँ? मृत्यु के द्वार के पार तो कोई तिनका भी नहीं ले जा सकता।”

महात्मा के चेहरे पर एक गहरी और करुणामयी मुस्कान तैर गई। उन्होंने राजा के कंधे पर हाथ रखा और बड़े ही सौम्य स्वर में कहा, “राजन! जब तुम यह भली-भांति जानते हो कि तुम इस तुच्छ सूखी पत्ती को भी अपने साथ परलोक नहीं ले जा सकते, तो फिर इस सोने-चांदी, महलों और अहंकार की भारी पोटली को साथ ले जाने की चिंता में अपना आज क्यों गंवा रहे हो? इस धरती पर जो कुछ भी तुमने कमाया है, वह यहीं का है और यहीं छूट जाएगा।”

महात्मा की यह बात सीधे राजा के अंतर्मन को छू गई। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे। राजा का भ्रम टूट चुका था और उसे जीवन का सबसे बड़ा सच समझ आ चुका था। उसने उसी क्षण से धन का संचय करने के बजाय अपनी प्रजा के कल्याण, प्रेम और धर्म के मार्ग पर चलना शुरू कर दिया।

कथा की सीख (Moral)

इस लोककथा से हमें यह सीख मिलती है कि मनुष्य इस संसार में खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही जाता है। भौतिक संपत्ति और अहंकार अस्थाई हैं। हमारी असली और स्थाई दौलत केवल हमारे अच्छे कर्म, दूसरों के प्रति हमारा प्रेम और परोपकार की भावना है, जो हमारे जाने के बाद भी इस संसार में जीवित रहती है।

कागा जी