काक-वाणी के प्रिय पाठकों, सीमा पर मुस्तैद हमारी कौआ बिरादरी ने अभी-अभी अपनी तेज नजरों से देखा कि ढाका में कुछ आलीशान सूटकेस बंद होते-होते अचानक फिर से खोल दिए गए। जी हां, हम बात कर रहे हैं बांग्लादेश के ‘संभावित’ भाग्यविधाता तारिक रहमान साहब की, जिनकी बहुप्रतीक्षित भारत यात्रा पर फिलहाल ‘तकनीकी ब्रेक’ लग गया है। इस खबर के आते ही अल जजीरा इस कदर छाती पीट रहा है, मानो इस यात्रा के टलने से दोनों देशों के बीच बहने वाली गंगा और तीस्ता नदियों का पानी अचानक सूख जाएगा!
कूटनीति का ‘फ्लाइट कैंसिलेशन’ और दिल्ली का मिजाज
राजनीति के गलियारों में जब किसी बड़े नेता की यात्रा ‘टलती’ है, तो इसका मतलब यह कतई नहीं होता कि उनका पासपोर्ट खो गया था या वीज़ा अधिकारी छुट्टी पर था। इसका सीधा सा मतलब होता है कि कूटनीति के तराजू पर अभी दोनों तरफ से ‘गिव एंड टेक’ का संतुलन नहीं बन पाया है। तारिक रहमान साहब और उनकी पार्टी बीएनपी शायद यह मानकर बैठे थे कि हसीना जी के जाते ही दिल्ली उनके स्वागत में लाल कालीन बिछाकर आरती का थाल सजाए खड़ी होगी। लेकिन दिल्ली का कूटनीतिक मिजाज थोड़ा अलग है; वह मेहमानों को चाय पिलाने से पहले उनके पुराने बही-खातों की जांच जरूर करती है।
अल जजीरा का रोना और ढाका की बेचैनी
इस यात्रा के टलने पर अल जजीरा के विश्लेषक इस तरह सिर पीट रहे हैं, मानो भारत-बांग्लादेश के रिश्ते केवल एक हवाई टिकट पर टिके थे। सच तो यह है कि बीएनपी के लिए दिल्ली का आशीर्वाद पाना अपनी खोई हुई साख को वापस पाने जैसा है। वे दिखाना चाहते हैं कि वे भारत-विरोधी नहीं हैं, लेकिन अतीत की कड़वी यादें इतनी जल्दी धुंधली नहीं होतीं। दिल्ली अभी ‘वेट एंड वॉच’ यानी ‘देखो और इंतजार करो’ की मुद्रा में है। जब तक ढाका से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और भारत-विरोधी तत्वों पर लगाम लगाने की ठोस गारंटी नहीं मिलती, तब तक दिल्ली का वीज़ा विभाग जरा ‘धीमे’ ही काम करेगा।
काक-दृष्टि: आगे का कूटनीतिक खेल
काक-वाणी की ओर से तारिक रहमान साहब को एक मुफ्त की नसीहत: सूटकेस को पूरी तरह से अलमारी में मत रखिए, बस उसकी धूल झाड़ते रहिए। दिल्ली का मौसम आजकल कभी गर्म तो कभी नर्म रहता है। जब तक कूटनीति की खिड़की से ठंडी हवा न आए, तब तक ढाका में बैठकर ही ‘भारत-मैत्री’ के सुर अलापते रहिए। आखिर, बगल के पड़ोसी से बिना हाथ मिलाए, तरक्की की छत पर अकेले टहलना मुमकिन नहीं होता!
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