अमेरिकी ‘पहचान की राजनीति’ और बेचारे हिंदू: विक्टिमहुड की रेस में ‘ज़ीरो पर आउट’!

नमस्कार! ‘काक-वाणी’ के इस नए अंक में आपका स्वागत है, जहाँ हम राजनीति के उस कचरे पर भी नज़र रखते हैं, जिसे सभ्य दुनिया परफ्यूम छिड़ककर छिपाने की कोशिश करती है। आज की ताज़ा ख़बर इंडियन एक्सप्रेस के हवाले से आई है—“अमेरिका की पहचान की राजनीति (Identity Politics) में हिंदू तो रेस में ही नहीं हैं!”

अहा! कितना गहरा और दर्दनाक सच है। बेचारे अमेरिकी हिंदू! रात-दिन गधों की तरह मेहनत करके सिलिकॉन वैली के सीईओ बन गए, नासा में रॉकेट उड़ाने लगे, और अमेरिका में सबसे ज़्यादा टैक्स भरने वाली बिरादरी बन बैठे। लेकिन वॉशिंगटन के ‘विक्टिमहुड ओलंपिक’ में क्या मिला? ठन-ठन गोपाल! अमेरिकी राजनीति का सीधा नियम है—यदि आपके पास पीड़ित होने का प्रमाणपत्र नहीं है, तो आपकी कोई राजनीतिक औकात नहीं है।

सीईओ बनने की सज़ा और विक्टिम कार्ड का अकाल

अंकल सैम के देश में सर्वाइव करने का एक ही गोल्डन रूल है—आपको खुद को उत्पीड़ित साबित करना होगा। लेकिन हिंदुओं ने कहाँ गलती कर दी? उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाई और ‘स्पेलिंग बी’ जिताने में लगा दिया, सुंदर पिचाई और सत्या नडेला पैदा कर दिए, और वीकेंड पर गरबा खेलने चले गए। अरे भाई! अगर आप इतने अमीर, पढ़े-लिखे और शांत रहेंगे, तो अमेरिकी वामपंथी (Leftists) आपको ‘पीड़ितों’ की पावन सूची में कैसे शामिल करेंगे?

अमेरिकी नेताओं के लिए हिंदू एक बेहद ‘बोरिंग’ समुदाय हैं। ना ये सड़कों पर पोस्टर फाड़ते हैं, ना गाड़ियों में आग लगाते हैं, और ना ही बात-बात पर ‘सिस्टम’ को गाली देते हैं। ये चुपचाप 80 घंटे काम करते हैं, टैक्स भरते हैं और शाम को मंदिर जाकर प्रसाद बांटते हैं। अब आप ही बताइए, ऐसे शरीफ़ लोगों से भला कौन सा राजनीतिक ड्रामा खड़ा किया जा सकता है?

अंकल सैम की राजनीति का नया गणित

अगर अमेरिकी राजनीति की मुख्यधारा में आना है, तो हिंदुओं को अपनी नीति बदलनी होगी। पढ़ाई-लिखाई छोड़कर थोड़ा रोना-धोना और हंगामा करना सीखना होगा। रिपब्लिकन पार्टी को लगता है कि ये ‘ब्राउन लोग’ हैं जो उनके पारंपरिक वोट बैंक को खा रहे हैं, और डेमोक्रेट्स को लगता है कि ये लोग ‘टू सक्सेसफुल’ (अत्यधिक सफल) हैं, इसलिए इन्हें किसी संरक्षण या रियायत की ज़रूरत नहीं है।

कुल मिलाकर बात यह है कि अमेरिका में पहचान की राजनीति का गोल्ड मेडल उसी को मिलता है जो सबसे बड़ा विक्टिम कार्ड खेल सके। जब तक अमेरिकी हिंदू अपनी ‘सफलता और शांति’ के खोल से बाहर निकलकर थोड़ा राजनीतिक उपद्रव नहीं करेंगे, तब तक वॉशिंगटन के गलियारों में उनकी हैसियत सिर्फ ‘टैक्स देने वाले भूतों’ जैसी ही बनी रहेगी। ‘काक-वाणी’ की सलाह है—सीईओ बनना छोड़िए, थोड़ा धरना देना सीखिए!


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कागा जी