गालीशास्त्र: भारतीय राजनीति का नया ‘काव्य’ रस और ‘सभ्य’ भाषा!

वाह! ‘द हिंदू’ के बुद्धिजीवियों ने आखिरकार हमारी राजनीति की उस ‘मधुर’ भाषा को पहचान ही ली, जिसे हम रोज़ टीवी चैनलों पर अपनी सुबह की चाय के साथ बड़े चाव से निगलते हैं। अखबार कहता है कि “अपशब्द और अमर्यादित भाषा” का नया दौर लौट आया है। अरे साहब, यह कोई लौटकर नहीं आया है, यह तो हमारी राजनीति की मुख्यधारा की ‘राष्ट्रभाषा’ बन चुकी है। अब वह दिन दूर नहीं जब विश्वविद्यालयों में ‘गालीशास्त्र’ में एमए और पीएचडी की डिग्रियां बांटी जाएंगी और हमारे माननीय इसके कुलपति होंगे।

संसद से सड़क तक: मर्यादा का ‘नया अवतार’

पुराने जमाने के नेता भी कितने बोरिंग हुआ करते थे! वे संसद में शेरो-शायरी करते थे, तर्कों से बात करते थे और विरोधियों का सम्मान करते थे। भला मर्यादा और तर्क से आज के युग में किसका पेट भरा है? आज के हमारे तेजस्वी नेताओं ने समय की नब्ज को पहचाना है। उन्होंने समझ लिया है कि जब तक आप विपक्षी को भरे मंच से कोई ‘चमकदार’ गाली या अमर्यादित विशेषण न दे दें, तब तक आपकी देशभक्ति और राजनीतिक कद अधूरा ही रहता है। गाली अब कोई दोष नहीं, बल्कि राजनीतिक योग्यता का नया पैमाना बन चुकी है। जितना गंदा बोलोगे, चुनावी टिकट मिलने की संभावना उतनी ही पक्की होगी।

शब्दकोश का अंत और ‘गालीतंत्र’ का उदय

काक-वाणी के पाठकों, जरा गंभीरता से सोचिए। हमारे नेतागण दिन-रात जनसेवा में इतने व्यस्त रहते हैं कि उनके पास शब्दकोश पलटने का फालतू समय नहीं है। इसलिए उन्होंने भाषा को एक ‘शॉर्टकट’ दे दिया है। जो बात पहले दस नीतिगत वाक्यों में समझाई जाती थी, अब वह मात्र एक अभद्र इशारे या एक तीखे अपशब्द में निपटा दी जाती है। इससे समय की भारी बचत होती है। जनता भी खुश होकर तालियां बजाती है, मीडिया को टीआरपी का ‘टॉनिक’ मिल जाता है और नेताओं का गला भी साफ हो जाता है। यह ‘ईजी ऑफ डूइंग पॉलिटिक्स’ का सबसे बेहतरीन उदाहरण है।

भाषा का यह ‘विकास’ अमर रहे!

इसलिए, अगली बार जब आप टीवी पर किसी राष्ट्रीय प्रवक्ता को सरेआम मर्यादा की धज्जियां उड़ाते देखें, तो कृपया अपना ब्लड प्रेशर न बढ़ाएं। बल्कि यह सोचकर गर्व महसूस करें कि हमारे राजनेता देश के भाषाई विकास में अपना ‘अमूल्य’ योगदान दे रहे हैं। लोकतंत्र के इस नए व्याकरण का स्वागत कीजिए, जहां गालियां ही अब नए ‘मंत्र’ हैं और मर्यादा सिर्फ किताबों की शोभा!


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कागा जी