बहुत समय पहले की बात है, एक समृद्ध नगर में धर्मदास नाम का एक बेहद अमीर व्यापारी रहता था। उसके पास आलीशान महल, नौकर-चाकर और अपार धन-दौलत थी। लेकिन इस सब के बावजूद, उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी और अशांति रहती थी। रात को उसे नींद नहीं आती थी और दिन भर वह अपनी संपत्ति को और बढ़ाने की चिंता में डूबा रहता था। उसका मन कभी शांत नहीं होता था।
शांति की तलाश और महात्मा का आश्रम
एक दिन धर्मदास को पता चला कि नगर के बाहर जंगल में एक पहुंचे हुए संत आए हैं, जो लोगों के दुखों का निवारण करते हैं। वह तुरंत उनके पास पहुंचा और अपनी समस्या बताई। धर्मदास ने रोते हुए कहा, “हे महात्मा! मेरे पास सब कुछ है, फिर भी मेरे मन में कोई सुख-शांति नहीं है। मुझे रात भर नींद नहीं आती। मुझे जीवन का वह सच बताइए जिससे मुझे शांति मिल सके।”
महात्मा मुस्कुराए और उन्होंने अपनी कुटिया से कपड़े की एक बेहद छोटी और साधारण सी दिखने वाली थैली निकाली। उन्होंने धर्मदास से कहा, “मैं तुम्हें परम शांति का रहस्य जरूर बताऊंगा, लेकिन पहले तुम्हें इस छोटी सी थैली को सोने के सिक्कों से पूरा भरना होगा।”
तृष्णा की अंतहीन थैली
धर्मदास को यह काम बहुत आसान लगा। उसने तुरंत अपने सेवकों को सोने के सिक्कों से भरा बड़ा थाल लाने का आदेश दिया। उसने हंसते हुए एक मुट्ठी सोने के सिक्के उस थैली में डाले, लेकिन थैली खाली की खाली रही। उसने पूरा थाल ही उसमें पलट दिया, फिर भी थैली नहीं भरी। हैरान होकर धर्मदास ने अपने घर से और सोना मंगवाया। देखते ही देखते उसकी तिजोरी का सारा सोना उस छोटी सी थैली में समा गया, लेकिन वह थैली वैसी ही सूखी और खाली दिख रही थी।
धर्मदास पूरी तरह से थक गया और उसका घमंड चूर-चूर हो गया। वह महात्मा के चरणों में गिर पड़ा और रोते हुए बोला, “महाराज, यह कैसी माया है? मेरी पूरी जिंदगी की कमाई इस छोटी सी थैली में समा गई, फिर भी यह खाली है। कृपया मुझे इसका सच बताइए।”
जीवन का सबसे बड़ा सच
महात्मा ने अत्यंत करुणामयी स्वर में कहा, “पुत्र, यह कोई जादुई थैली नहीं है। यह मनुष्य की ‘तृष्णा’ (लालसा और इच्छा) से बनी थैली है। जैसे इस थैली का पेट कभी नहीं भर सकता, वैसे ही मनुष्य का मन कभी भी भौतिक वस्तुओं से संतुष्ट नहीं हो सकता। इंसान अपनी इच्छाओं की थैली को भरने के लिए जिंदगी भर भागता रहता है, लेकिन मौत आने तक भी वह थैली खाली ही रहती है।”
उन्होंने आगे समझाया कि जब तक इंसान अपनी तुलना दूसरों से करता रहेगा और अधिक पाने की अंधी दौड़ में भटकेगा, तब तक वह अशांत रहेगा। जीवन का असली सच यह है कि सुख बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि मन के भीतर के संतोष में है। धर्मदास की आँखें खुल गईं और उसने अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा गरीबों की भलाई में लगा दिया और जीवन में पहली बार सच्ची शांति का अनुभव किया।
सीख: इस लोककथा से हमें यह सीख मिलती है कि संतोष ही जीवन का सबसे बड़ा धन है। बाहरी चमक-दमक और अंतहीन इच्छाएं इंसान को कभी सुखी नहीं बना सकतीं। जो प्राप्त है, उसमें खुश रहना ही जीवन का वास्तविक सच है।