स्वागत है देशवासियों! अगर आप भी आयकर (Income Tax) की मार से त्रस्त हैं, रात-दिन गधे की तरह मेहनत करके सरकार की तिजोरी भर रहे हैं और फिर ‘पनीर से लेकर पराठे’ तक पर जीएसटी चुका रहे हैं, तो आपके लिए ‘काक-वाणी’ आज एक क्रांतिकारी ‘बिज़नेस आइडिया’ लेकर आई है। स्टार्टअप इंडिया के चक्कर में मत पड़िए, असली मलाई तो ‘पार्टी इंडिया’ में है। नौकरी-धंधा छोड़िए और तुरंत नेता बन जाइए!
दस हजार करोड़ का ‘पवित्र’ खेल
हाल ही में ‘द प्रिंट’ ने एक ऐसा सनसनीखेज खुलासा किया है, जिसने देश के बड़े-बड़े चार्टर्ड अकाउंटेंट्स को भी चक्कर में डाल दिया है। खबर है कि भारत के उन ‘गुमनाम’ और ‘पॉकेट-साइज’ राजनीतिक दलों के पास, जिनका नाम खुद उनके संस्थापकों के परिवार वाले भी भूल चुके होंगे, १०,००० करोड़ रुपये से अधिक का चंदा जमा है। जी हां, पूरे १०,००० करोड़! इतने पैसे में तो अंतरिक्ष में दो-चार नए ग्रह खोजे जा सकते थे, लेकिन हमारे देश के इन महान ‘लेटरपैड’ दलों ने इसे अपने खातों में सुरक्षित रखा हुआ है। कमाल की बात यह है कि इनमें से ९० प्रतिशत पार्टियों ने आज तक वार्ड कमिश्नर का चुनाव भी नहीं लड़ा है। इसे कहते हैं बिना परीक्षा दिए ही सीधे मेरिट लिस्ट में टॉप कर जाना!
वोट नहीं चाहिए साहब, सिर्फ ‘नोट’ दीजिए!
अब देश की भोली जनता सोच रही होगी कि बिना चुनाव लड़े, बिना कोई रैली किए और बिना जनता के बीच हाथ जोड़े इन पार्टियों के खजाने में यह कुबेर का धन आता कहां से है? अरे भाइयों, यही तो भारतीय लोकतंत्र का असली ‘जादू’ है। यह पार्टियां चुनाव जीतने के लिए नहीं, बल्कि अमीरों के ‘काले धन’ को गंगाजल की तरह पवित्र यानी ‘सफेद’ करने के लिए बनाई जाती हैं। टैक्स बचाने के शौकीन लोग अपनी अघोषित कमाई इन पार्टियों को ‘चंदे’ के रूप में देते हैं और फिर पिछले दरवाजे से अपना कमीशन काटकर वापस ले लेते हैं। आयकर विभाग भी इन पर वैसी ही दयादृष्टि रखता है, जैसी भक्त पर भगवान रखते हैं।
आप भी खोलिए अपनी ‘पार्टी’
इसलिए, ‘काक-वाणी’ की मुफ़्त और जनहित में जारी सलाह है कि समय बर्बाद न करें। तुरंत चुनाव आयोग के दफ्तर जाएं और अपनी एक नई पार्टी पंजीकृत कराएं। नाम रख लीजिए – ‘अखिल भारतीय टैक्स बचाओ मोर्चा’ या ‘परम आदरणीय चंदा वसूली पार्टी’। इसके बाद न तो आपको वोट मांगने की झंझट होगी और न ही जनता के झूठे वादे करने पड़ेंगे। बस एक छोटा सा कमरा किराए पर लीजिए, एक बोर्ड लगाइए और देश के धनकुबेरों को टैक्स-फ्री सेवाएं देना शुरू कीजिए। जब व्यवस्था ही आपको कानूनी रूप से ‘लूट’ की छूट दे रही है, तो फिर आम आदमी बनकर टैक्स चुकाने की मूर्खता क्यों करना? आखिर लोकतंत्र का असली स्वाद तो इसी टैक्स-फ्री मलाई में है!
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