एक पिता का असहनीय दर्द
बहुत समय पहले की बात है, एक समृद्ध राज्य में धर्मपाल नाम का एक बहुत ही धनी व्यापारी रहता था। उसके पास धन, संपत्ति और मान-सम्मान की कोई कमी नहीं थी। लेकिन उसका सबसे बड़ा खजाना उसका इकलौता पुत्र था। नियति का खेल ऐसा बदला कि एक दिन अचानक बीमारी के कारण उसके बेटे का असमय निधन हो गया। जवान बेटे की मृत्यु ने धर्मपाल को भीतर से पूरी तरह झकझोर कर रख दिया। वह दिन-रात रोता रहता और किसी भी कीमत पर अपने बेटे को वापस पाने की जिद पर अड़ गया था।
महात्मा की अनोखी शर्त
धर्मपाल की यह दर्दनाक हालत देखकर एक शुभचिंतक ने उसे जंगल में रहने वाले एक सिद्ध महात्मा के पास जाने की सलाह दी। धर्मपाल बिना समय गंवाए महात्मा की कुटिया में पहुंचा और उनके चरणों में गिरकर रोने लगा, “हे महात्मा! आप तो चमत्कारी हैं। कृपा कर मेरे मृत बेटे को जीवित कर दीजिए। मैं अपनी सारी धन-दौलत आपके चरणों में अर्पित कर दूंगा।”
महात्मा ने धर्मपाल की आंखों में छिपे अथाह दर्द को देखा। उन्होंने बड़ी शांति से मुस्कुराते हुए कहा, “पुत्र, मैं तुम्हारे बेटे को पुनः जीवित कर सकता हूं, लेकिन इसके लिए तुम्हें एक छोटी सी सामग्री लानी होगी।” धर्मपाल उत्सुकता से उठ खड़ा हुआ और बोला, “बताइए महाराज, मैं क्या लेकर आऊं?”
महात्मा ने कहा, “तुम्हें नगर के किसी ऐसे घर से एक मुट्ठी सरसों के दाने लाने होंगे, जिस घर में कभी किसी व्यक्ति की मृत्यु न हुई हो और न ही वहां कोई कभी दुखी हुआ हो।”
एक मुट्ठी सरसों की खोज
धर्मपाल बेहद खुश हुआ। उसे लगा कि एक मुट्ठी सरसों लाना भला कौन सी बड़ी बात है। वह तुरंत नगर की ओर दौड़ा। वह सबसे पहले एक भव्य हवेली पर पहुंचा और गृहस्वामी से अपनी मांग रखी। हवेली के मालिक ने गहरी सांस लेते हुए कहा, “भाई, सरसों तो मैं तुम्हें बोरियां भरकर दे दूंगा, लेकिन पिछले ही वर्ष मेरे पूज्य पिता जी का देहांत हुआ है। हमारा घर तो अभी भी शोक में डूबा है।”
निराश होकर धर्मपाल दूसरे घर गया। वहां एक महिला ने रोते हुए कहा, “मेरे घर में सरसों तो बहुत है, लेकिन पिछले महीने ही मेरी जवान बेटी महामारी की भेंट चढ़ गई। हमारा दुख तो पहाड़ जैसा है।”
धर्मपाल सुबह से शाम तक पूरे नगर के हर छोटे-बड़े घर में भटका। लेकिन उसे एक भी ऐसा घर नहीं मिला जहां कभी किसी अपने की मृत्यु न हुई हो या जहां दुख का साया न मंडराया हो। हर घर की अपनी एक अलग और मर्मस्पर्शी कहानी थी।
जीवन का परम सत्य
शाम ढलते-ढलते धर्मपाल के पैर थक चुके थे, लेकिन उसका मन अब शांत और निर्मल हो रहा था। उसे इस बात का गहरा अहसास हो चुका था कि इस संसार में केवल वह अकेला दुखी नहीं है। मृत्यु और वियोग तो जीवन के अनिवार्य और शाश्वत हिस्से हैं, जिनसे कोई भी बच नहीं सकता।
वह खाली हाथ वापस महात्मा की कुटिया में लौटा। महात्मा ने उसकी ओर देखा और पूछा, “क्या तुम्हें सरसों के दाने मिले, धर्मपाल?”
धर्मपाल महात्मा के चरणों में गिर पड़ा और बोला, “नहीं महाराज, और अब मुझे उनकी आवश्यकता भी नहीं है। मुझे जीवन का सबसे बड़ा सच समझ आ गया है। जो इस नश्वर संसार में आया है, उसका जाना निश्चित है। हमारा मोह ही हमारे दुखों का सबसे बड़ा कारण है।”
कहानी की सीख (Moral of the Story)
सीख: यह जीवन का सच बताने वाली लोककथा हमें सिखाती है कि मृत्यु सृष्टि का अंतिम और अटल सत्य है। इस संसार में सुख और दुख धूप-छांव की तरह आते-जाते रहते हैं। किसी भी सांसारिक वस्तु या व्यक्ति से अत्यधिक मोह ही हमारे दुखों को जन्म देता है। इसलिए, अतीत के शोक में डूबने के बजाय, वर्तमान को स्वीकार करना और उसमें जीना ही सच्ची मानसिक शांति का मार्ग है।