काक-वाणी की मुंडेर पर आज चर्चा गरम है! जब ‘हासिल’ और ‘पान सिंह तोमर’ जैसी कल्ट फिल्में बनाने वाले दिग्गज निर्देशक तिग्मांशु धूलिया कुछ बोलते हैं, तो बॉलीवुड के गलियारों में सन्नाटा खिंच जाता है। हाल ही में तिग्मांशु ने चिंता जताई कि हिंदी सिनेमा में ‘एंटी-मुस्लिम’ नैरेटिव लगातार बढ़ रहा है। अब सवाल यह है कि क्या सच में बॉलीवुड का चश्मा बदल गया है, या फिर यह सिर्फ बदलते वक्त और बॉक्स ऑफिस के समीकरणों का खेल है? आइए, लेते हैं इस मुद्दे पर एक ‘काउंटरव्यू’!
सिनेमा का बदलता रंग या सिर्फ बॉक्स ऑफिस का नया ‘फॉर्मूला’?
तिग्मांशु जी की चिंता अपनी जगह हो सकती है, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी देखना जरूरी है। बॉलीवुड हमेशा से उसी दिशा में भागता है, जहां दर्शक जाते हैं। जब ‘रोमांस’ का दौर था, तो हर कोई सरसों के खेत में दौड़ रहा था। आज जब ‘राष्ट्रवाद’ और ‘ऐतिहासिक सच’ की मांग है, तो फिल्ममेकर्स इतिहास के पन्नों को खंगाल रहे हैं। इसे किसी एक समुदाय के खिलाफ ‘एजेंडा’ कहने के बजाय, इसे दर्शकों की बदलती पसंद और फिल्ममेकर्स की कमर्शियल मजबूरी के रूप में देखा जाना चाहिए। आखिर धंधा तो दर्शकों की तालियों से ही चलता है!
इतिहास की कड़वी सच्चाई या प्रोपेगैंडा?
एक काउंटरव्यू यह भी है कि सालों तक बॉलीवुड पर ‘सॉफ्ट नैरेटिव’ चलाने के आरोप लगते रहे हैं, जहां अक्सर गंभीर संवेदनशील मुद्दों को कालीन के नीचे दबा दिया जाता था। अब अगर कुछ फिल्में इतिहास की कड़वी सच्चाइयों या किसी खास दौर के सच को बिना किसी फिल्टर के दिखा रही हैं, तो उसे ‘एंटी-मुस्लिम’ का ठप्पा क्यों दिया जाए? क्या दर्शकों को यह तय करने का हक नहीं है कि क्या सही है और क्या गलत?
दर्शकों की समझदारी पर भरोसा जरूरी है
तिग्मांशु धूलिया जैसे दिग्गज निर्देशकों को दर्शकों की समझ पर थोड़ा भरोसा रखना चाहिए। आज का दर्शक बहुत स्मार्ट है। अगर फिल्म की कहानी में दम नहीं है, तो चाहे वह कितना भी बड़ा नैरेटिव सेट करने की कोशिश करे, बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरती ही है। सिर्फ ‘प्रो’ या ‘एंटी’ होने से फिल्में हिट नहीं होतीं, दमदार कंटेंट ही असली राजा है।
काक-वाणी का सीधा सा नजरिया है – सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन और कला के चश्मे से देखें। जब तक दर्शक समझदार हैं, तब तक न तो कोई प्रोपेगैंडा लंबे समय तक टिक सकता है और न ही कोई जबरन थोपा गया नैरेटिव!
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