वाह! धन्य है हमारा महान लोकतंत्र और उससे भी महान हमारे राजनेता। जब दुनिया युद्ध, वैश्विक मंदी और जलवायु परिवर्तन जैसी मामूली समस्याओं से जूझ रही है, तब हमारे देश के दूरदर्शी नेता एक अत्यंत गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर आपस में भिड़ गए हैं। मुद्दा क्या है? ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के नेताओं को परोसा गया भोजन! जी हां, कूटनीति अब फाइलों से निकलकर सीधे डिनर प्लेट में आ गिरी है।
कांग्रेस को अचानक चिंता सताने लगी है कि ब्रिक्स के वैश्विक मंच पर परोसा गया अस्सी प्रतिशत भोजन ‘नॉन-वेज’ था। राहुल गांधी की पार्टी को शायद यह डर है कि पुतिन और शी जिनपिंग को पनीर टिक्का न खिलाकर भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ कमजोर हो गई है। वहीं, हमारी परम राष्ट्रवादी सत्ताधारी पार्टी बीजेपी भला इस ‘खाद्य-जिहाद’ पर चुप कैसे रहती? उसने तुरंत पलटवार करते हुए राहुल गांधी को घेर लिया और आरोप लगाया कि कांग्रेस अब वैश्विक नेताओं की थाली पर भी ओछी राजनीति कर रही है।
कबाब से तय होगी नई विश्व व्यवस्था?
काक-वाणी की पैनी नजर से देखें तो यह बहस बेहद क्रांतिकारी है। अब तक हम सोचते थे कि ब्रिक्स जैसे मंचों पर बहुध्रुवीय दुनिया (Multipolar World) और नए आर्थिक कॉरिडोर पर चर्चा होती है। लेकिन असल में असली कूटनीति तो ‘कढ़ाई चिकन’ और ‘शाही पनीर’ के बीच के द्वंद्व में छिपी थी। सोचिए, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आएं और उन्हें शुद्ध शाकाहारी सोया चाप परोसा जाए, तो क्या वे यूक्रेन युद्ध तुरंत रोक नहीं देते? चीनी राष्ट्रपति अगर दाल मखनी खा लेते, तो क्या सीमा विवाद हमेशा के लिए नहीं सुलझ जाता? कांग्रेस का दर्द शायद यही है कि सरकार ने इस ‘सब्जी-कूटनीति’ का स्वर्ण अवसर गंवा दिया।
बीजेपी का गुस्सा भी पूरी तरह जायज है। आखिर विदेशी मेहमानों की थाली में क्या परोसा जा रहा है, इस पर सवाल उठाना सीधे-सीधे देश की संप्रभुता पर हमला है। अगर मेहमान कबाब खाना चाहते हैं, तो क्या हम उन्हें जबरन लौकी का कोफ्ता खिलाएंगे? यह तो अंतरराष्ट्रीय मेहमाननवाजी के नियमों के खिलाफ होगा।
थाली, राजनीति और जनता का पेट
इस पूरे ड्रामे में सबसे मजेदार बात यह है कि देश की जनता, जो खुद टमाटर और प्याज के दामों से त्रस्त होकर ‘हाफ-प्लेट’ जिंदगी जी रही है, वह टीवी चैनलों पर बड़े चाव से देख रही है कि विदेशी नेताओं ने अस्सी प्रतिशत मांसाहारी भोजन का आनंद लिया या नहीं। नेताओं के इस ‘बौद्धिक’ स्तर को देखकर कौआ भी अपनी कांव-कांव भूलकर सिर पकड़ चुका है।
अंततः, काक-वाणी का यही सुझाव है कि अगली बार जब भी कोई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हो, तो विदेश मंत्रालय के साथ-साथ एक विशेष ‘थाली मंत्रालय’ का भी गठन किया जाए, जिसके अध्यक्ष खुद हमारे दोनों पक्षों के नेता हों। कम से कम इसी बहाने संसद में ‘चिकन’ और ‘पनीर’ पर सर्वसम्मति तो बन सकेगी!
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