‘मदर इंडिया’ के त्याग से ‘कॉकटेल’ के टशन तक: क्या वाकई आजाद हुई बॉलीवुड की नारी?

बॉलीवुड का महिलाओं से रिश्ता बड़ा ही अतरंगा रहा है। कभी वे पूजनीय देवी बन जाती हैं, तो कभी सिर्फ आइटम नंबर्स की रौनक। हाल ही में आई मीडिया रिपोर्ट्स ने फिर से वही पुराना लेकिन सुलगता हुआ सवाल उठाया है – क्या ‘मदर इंडिया’ से लेकर ‘कॉकटेल 2’ तक के सफर में हमारी फिल्मों ने महिलाओं को वाकई ‘एजेंसी’ यानी अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने का अधिकार दिया है?

सती-सावित्री से शॉर्ट स्कर्ट तक का सफर

जरा फ्लैशबैक में चलिए। साल 1957 में आई कल्ट क्लासिक Mother India में नरगिस ने एक ऐसी मां का किरदार निभाया जो अपने सिद्धांतों और समाज की लाज के लिए अपने ही बागी बेटे को गोली मार देती है। वह त्याग की मूरत थी, सहनशीलता की देवी थी। लेकिन क्या उसे खुद के लिए जीने की आजादी थी? शायद बिल्कुल नहीं। अब जरा छलांग मारकर आज के दौर की फिल्मों पर आइए। ‘कॉकटेल’ में वेरोनिका मॉडर्न है, बिंदास है और अपनी मर्जी से जीती है। लेकिन क्लाइमेक्स आते-आते, ‘संस्कारी’ लड़का उसी लड़की को अपनाता है जो सीधी-सादी और घरेलू है। तो आखिर बदला क्या? सिर्फ कपड़े और गानों के बीट्स!

क्या बोल्ड होना ही असली महिला सशक्तिकरण है?

आजकल की फिल्मों और आने वाली ‘कॉकटेल 2’ जैसी फिल्मों की चर्चाओं को देखकर लगता है कि बॉलीवुड ने ‘एम्पावरमेंट’ का मतलब सिर्फ हाथ में शराब का गिलास थमा देना या शॉर्ट कपड़े पहनाना समझ लिया है। अगर कोई महिला स्क्रीन पर खुलकर अपनी सेक्सुअलिटी की बात करती है या चार गालियां दे देती है, तो मेकर्स उसे ‘फ्री-स्पिरिटेड’ घोषित कर देते हैं। लेकिन क्या असल जिंदगी में महिलाएं सिर्फ इसी आजादी के लिए तरस रही हैं? असली एजेंसी तो तब होगी जब स्क्रीन पर महिलाओं के करियर, उनकी महत्वाकांक्षाओं और उनके फैसलों को बिना किसी पुरुष के ठप्पे के दिखाया जाए। आज भी अगर कोई हिरोइन अपने हक के लिए अड़ती है, तो उसे स्क्रीन पर अक्सर ‘तेज-तर्रार’ के रूप में पेश किया जाता है, जबकि पुरुष का वही अंदाज ‘एंग्री यंग मैन’ कहलाता है।

काक-वाणी की खरी-खरी

काक-वाणी की पैनी नजर कहती है कि बॉलीवुड की गाड़ी अभी भी पुरानी लीक पर ही चल रही है, बस डिब्बे नए रंग-रोगन के साथ चमका दिए गए हैं। जब तक फिल्मों में महिलाओं को सिर्फ पुरुषों के नजरिए (Male Gaze) से देखना बंद नहीं किया जाएगा, तब तक ‘वूमन ओरिएंटेड’ फिल्मों का दावा खोखला ही रहेगा। दर्शकों को अब ‘त्याग की देवी’ और ‘अल्ट्रा-मॉडर्न रीबेल’ के बीच के असली इंसानी किरदारों की तलाश है। उम्मीद है कि हमारे फिल्ममेकर्स अब पोस्टर के साथ-साथ अपनी सोच की पटकथा भी बदलेंगे!


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कागा जी