लोकतंत्र का अति-सुरक्षित सर्कस: जब मुख्य चुनाव आयुक्त को बचाने के लिए दिल्ली बन गई ‘छावनी’!

नमस्कार, ‘काक-वाणी’ के प्रबुद्ध और सहमे हुए पाठकों! अगर इन दिनों आप दिल्ली की सड़कों पर निकलने का दुस्साहस कर रहे हैं, तो अपनी जेब में पासपोर्ट और पहचान पत्र जरूर रखें। ऐसा न हो कि आप अपनी ही गली में नुक्कड़ पर चाय पीने निकलें और आपको लगे कि आप गलती से किसी युद्ध क्षेत्र में आ गए हैं। खबर आई है कि हमारे आदरणीय मुख्य चुनाव आयुक्त (Poll Chief) साहब के खिलाफ विपक्ष के एक विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली में हजारों की संख्या में सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं। वाह! इसे कहते हैं ‘विश्वगुरु’ का महान लोकतंत्र, जहाँ प्रजा से ही राजा के तंत्र को बचाना पड़ रहा है!

निष्पक्षता की रक्षा बंदूक की नोक पर!

विदेशी समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट का मानना है कि दिल्ली को यह छावनी किसी दुश्मन देश के हमले से बचाने के लिए नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की उस ‘पवित्र निष्पक्षता’ की रक्षा के लिए बनाया गया है, जिस पर विपक्षी दल बार-बार बेवजह की उंगलियां उठाते रहते हैं। हमारे महान तंत्र की खूबसूरती तो देखिए—चुनाव प्रमुख साहब और उनकी पूरी मशीनरी इतनी निष्पक्ष, पारदर्शी और बेदाग है कि इस पारदर्शिता को ढंकने के लिए 10 फीट ऊंचे लोहे के बैरिकेड्स, कंक्रीट के ब्लॉक, कंटीले तार और दंगारोधी बख्तरबंद गाड़ियों की जरूरत पड़ रही है।

अरे भाई, जब चुनाव आयोग एकदम ‘दूध का धुला’ है, तो फिर इतना खौफ किस बात का? शायद डर इस बात का है कि कहीं जनता का एक सीधा सवाल पूछ लेना ही हमारी कानून-व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा ‘परमाणु खतरा’ न बन जाए!

विरोध प्रदर्शन या कोई राष्ट्रव्यापी संकट?

अब तो यह देश का नियम बन चुका है—जब भी कोई नागरिक या विपक्षी नेता सवाल पूछने के लिए सड़क पर कदम रखने की सोचे, तो पूरी राजधानी की किलेबंदी कर दो। मेट्रो स्टेशन बंद कर दो, सड़कें सील कर दो और इंटरनेट गिरा दो! विपक्ष का काम है शिकायत करना, और सरकार का परम कर्तव्य है कि उस शिकायत की आवाज को अर्द्धसैनिक बलों के बूटों की धमक के नीचे दबा देना।

‘काक-वाणी’ का सीधा और निष्पक्ष आकलन है—अगर आपको अपनी निष्पक्षता पर इतना ही भरोसा है, तो फिर यह फौज किसके लिए? खैर, देश की जनता को अब यह समझ लेना चाहिए कि वोट की पर्ची डालना ही आपका आखिरी अधिकार था। उस पर्ची की गिनती करने वाले आकाओं की मंशा पर सवाल उठाना ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का उल्लंघन माना जा सकता है। इसलिए शांति बनाए रखिए, लोहे के बैरिकेड्स को निहारिए और इस ‘सुरक्षित’ लोकतंत्र का घर बैठे आनंद लीजिए!


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कागा जी