सत्ता तो आनी-जानी है, पर व्हाट्सएप फॉरवर्ड अमर रहेगा!

स्वराज्य पत्रिका ने अपने एक लेख से दक्षिणपंथी विचारकों के ‘राष्ट्रवादी’ चश्मे पर ऐसी धूल झोंकी है कि बेचारे अब तक आंखें मल रहे हैं। लेख का रोना यह है कि हमारे दक्षिणपंथी भाइयों ने पिछले दस सालों में सत्ता का आनंद तो खूब लिया, लेकिन ऐसा कोई मजबूत बौद्धिक किला या ‘इकोसिस्टम’ नहीं बनाया जो सरकार जाने के बाद भी उनकी रक्षा कर सके। अब भला यह भी कोई बात हुई? स्वराज्य वालों को शायद हमारी असली ताकत का अंदाजा नहीं है!

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की डिग्री पर ये अविश्वास क्यों?

लेखकों को लगता है कि वामपंथियों ने जेएनयू, लुटियंस दिल्ली और बड़े-बड़े अकादमिक संस्थानों पर जो सत्तर साल तक राज किया, वैसा कुछ दक्षिणपंथी नहीं कर पाए। अरे भाई, आप उनके बड़े-बड़े थिंक-टैंक और किताबों की बात करते हैं, और यहां हमारे वीरों ने ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ खड़ी कर दी है! सुबह-सुबह ‘सुविचार’ के साथ इतिहास को बदलने की जो अद्भुत कला हमारे पास है, क्या वो किसी जेएनयू के प्रोफेसर के पास है? एक क्लिक पर सिकंदर को हराने और ताजमहल को ‘तेजो महालय’ साबित करने की शक्ति को आप ‘अस्थायी’ कह रहे हैं? यह तो सरासर अन्याय है!

बिना सरकारी ऑक्सीजन के कैसे जिएंगे हमारे सूरमा?

हालांकि, स्वराज्य ने एक कड़वी सच्चाई की तरफ इशारा जरूर किया है। वामपंथी जब सत्ता से बाहर होते हैं, तब भी विदेशी अखबारों में कॉलम लिखते हैं, एनजीओ चलाते हैं और अदालतों में जनहित याचिकाएं लगाते हैं। लेकिन हमारे दक्षिणपंथी सूरमाओं का क्या होगा? अगर कल को सत्ता बदल गई, तो क्या हमारे टीवी एंकर वापस असली पत्रकारिता करने लगेंगे? क्या हमारे ट्रोल सेनापति फिर से बेरोजगार हो जाएंगे? स्वराज्य का डर जायज है कि दक्षिणपंथियों ने अपनी कोई स्वतंत्र बौद्धिक जमीन तैयार नहीं की है। उनका पूरा वजूद सरकारी विज्ञापनों, सरकारी पदों और टीवी स्टूडियो के वातानुकूलित कमरों तक ही सीमित रह गया है।

शहरों के नाम बदलने से आगे भी है एक दुनिया

‘काक-वाणी’ का तो यही मानना है कि प्रिय मित्रों, सिर्फ शहरों के नाम बदलने, इतिहास की किताबों को कोसने और ट्विटर पर रोज एक नया नैरेटिव सेट करने से कोई ‘अमर साम्राज्य’ नहीं बनता। जब सत्ता की धूप ढलेगी, तो सबसे पहले वही दरबारी भागेंगे जो आज सबसे तेज चिल्ला रहे हैं। तब आपके पास न तो कोई बड़ा मीडिया हाउस होगा जो बिना सरकारी मदद के चल सके, और न ही कोई ऐसा विश्वविद्यालय जहां आपकी विचारधारा का सम्मान हो। इसलिए, थोड़ा समय व्हाट्सएप से निकालकर असल दुनिया में भी कुछ टिकाऊ बना लीजिए, वरना अगली सरकार आते ही आपका यह पूरा ‘डिजिटल राष्ट्रवाद’ केवल ‘एरर 404: पेज नॉट फाउंड’ बनकर रह जाएगा!


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कागा जी