गाली-शास्त्र: भारतीय राजनीति का नया ‘व्याकरण’ और मर्यादा की अंतिम विदाई

लोकतंत्र के पावन मंदिर में अब तर्कों और सिद्धांतों की जगह ‘नए भाषाई अलंकारों’ ने ले ली है। ‘द हिंदू’ ने तो सिर्फ एक इशारा किया है, असल में तो हमारे माननीय नेताओं ने भाषा का ऐसा ‘शुद्धिकरण’ किया है… Continue Reading →

अपशब्दों का नया ‘अमृतकाल’: जब गाली बनी भारतीय राजनीति की नई ‘मातृभाषा’

काक-वाणी के सभी सुधी पाठकों को कांव-कांव भरा नमस्कार! हाल ही में ‘द हिंदू’ अखबार ने एक बड़ा ही गंभीर लेख छापा है, जिसका लब्बोलुआब यह है कि राजनीति में ‘अपशब्द’ और ‘गाली-गलौज’ अब एक नई राजनीतिक भाषा बन चुके… Continue Reading →

विजय का ‘राजनीतिक धमाका’: थियेटर से सीधे लोकतंत्र के अखाड़े तक!

भारत में लोकतंत्र एक ऐसा उत्सव है जहां हर पांच साल में एक नई फिल्म रिलीज होती है। लेकिन इस बार तमिलनाडु से खबर आई है कि वहां सचमुच की एक ‘ब्लॉकबस्टर’ रिलीज होने वाली है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस… Continue Reading →

अपरिग्रह का सबसे महंगा तमाशा: गांधीजी के रफ नोट्स बिके 14 करोड़ में!

वाह रे पूंजीवाद! जिसे गांधी जी ताउम्र कोसते रहे, उसी पूंजीवाद ने उनकी रद्दी (माफ कीजिएगा, ऐतिहासिक दस्तावेज) को 1.7 मिलियन डॉलर यानी लगभग 14 करोड़ रुपये में खरीद लिया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, जिन्होंने जीवन भर ‘अपरिग्रह’ (जरूरत से ज्यादा… Continue Reading →

महात्मा का ‘सस्ता’ सत्य और 1.7 मिलियन डॉलर की ‘अहिंसा’!

वाह री दुनिया! और वाह रे इस दुनिया का अति-क्रूर पूंजीवाद! जो इंसान जिंदगी भर लंगोटी पहनकर ‘अपरिग्रह’ यानी संपत्ति न जोड़ने का उपदेश देता रहा, आज उसी के हाथ से लिखे कुछ फटे-पुराने पन्नों को किसी बड़े रईस ने… Continue Reading →

सूटकेस तैयार, वीजा नदारद: तारिक रहमान की अधूरी दिल्ली यात्रा और अल जज़ीरा का विलाप

वाह री कूटनीति! बांग्लादेश में सत्ता के रंगमंच पर अभी नए किरदारों की एंट्री ठीक से हो भी नहीं पाई थी कि बीएनपी के ‘लंदन-रिटर्न’ भाग्यविधाता तारिक रहमान साहब ने दिल्ली आने के लिए अपने सूटकेस में ढाकाई मलमल और… Continue Reading →

सिनेमाई ‘विस्फोट’ से राजनीति में ‘महा-क्रांति’: थलपति विजय का ‘फ्लॉप-प्रूफ’ पॉलिटिकल मॉडल!

वाह! क्या खबर है! अंग्रेजी अखबार की यह हेडलाइन पढ़कर हमारी ‘काग-दृष्टि’ धन्य हो गई। लिखा है—”तमिलनाडु का विजय मॉडल भारत में राजनीतिक उथल-पुथल (डिस्ट्रप्शन) मचा सकता है।” सचमुच, यह विश्लेषण पढ़कर देश के सारे राजनीति शास्त्री और समाजशास्त्री अपनी… Continue Reading →

सूटकेस तैयार, विमान नदारद: तारिक रहमान की ‘दिल्ली यात्रा’ पर काक-वाणी

काक-वाणी के प्रिय पाठकों, सीमा पर मुस्तैद हमारी कौआ बिरादरी ने अभी-अभी अपनी तेज नजरों से देखा कि ढाका में कुछ आलीशान सूटकेस बंद होते-होते अचानक फिर से खोल दिए गए। जी हां, हम बात कर रहे हैं बांग्लादेश के… Continue Reading →

नेहरू की आत्मा और मोदी जी की ‘उम्मीद’: जब तक कांग्रेस है, तब तक बहाने हैं!

देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए की महाबैठक में एक बार फिर इतिहास के पन्नों से धूल झाड़ते हुए वह महामंत्र दोहराया है, जो पिछले दस सालों से हमारी राष्ट्रीय चेतना को जीवित रखे हुए है। जी हां,… Continue Reading →

‘अपरिग्रह’ का ग्लोबल सेल: जब गांधीजी के फटे-पुराने पन्ने 14 करोड़ रुपये में बिक गए!

महात्मा गांधी ने जीवन भर दुनिया को ‘अपरिग्रह’ का पाठ पढ़ाया। यानी उतनी ही चीजें पास रखना जितनी जीने के लिए जरूरी हों। उन्होंने खुद एक धोती, एक घड़ी और एक चश्मे में पूरी जिंदगी गुजार दी। लेकिन आज की… Continue Reading →