‘संस्कृति’ का शॉक और राहुल गांधी का ‘रॉक’: जब गालियों पर छिड़ गया संस्कारी युद्ध!

भारतीय राजनीति में ‘संस्कृति’ एक ऐसा रबर बैंड है, जिसे जब मर्जी, जितना मर्जी खींच लिया जाता है। हाल ही में, सीजेआई (CJI) विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ महिलाओं द्वारा अपशब्दों का प्रयोग करने पर हमारे परम आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को गहरा ‘कल्चर शॉक’ (सांस्कृतिक झटका) लग गया। अब जहाँ शॉक लगेगा, वहाँ हमारे विपक्षी रॉकस्टार राहुल गांधी भला वोल्टेज जांचने से कैसे पीछे रह सकते थे? उन्होंने तुरंत इस ‘शॉक’ की फ्रीक्वेंसी पर सवाल उठा दिए हैं और पूछा है कि आखिर असली सदमा किसे लगना चाहिए।

संस्कृति का नाजुक शीशा और प्रधानमंत्री का कोमल हृदय

काक-वाणी के विशेष राजनीतिक विश्लेषक कौवे बताते हैं कि देश में बेरोजगारी, महंगाई, और नेताओं की दल-बदलू कलाबाजी जैसी मामूली बातें तो प्रधानमंत्री के फौलादी सीने को छू भी नहीं पातीं। लेकिन प्रदर्शनकारी महिलाओं के मुंह से निकले कुछ कड़े शब्द सीधे उनके ‘संस्कारी’ कानों को पार कर दिल पर चोट कर गए। राहुल गांधी ने इसी बात पर तंज कसते हुए पूछा है कि आखिर प्रधानमंत्री जी का यह ‘संस्कृति-मीटर’ काम कैसे करता है? जब मणिपुर में महिलाओं के साथ बर्बरता हो रही थी, तब इस महान संस्कृति को कोई ‘शॉक’ क्यों नहीं लगा? शायद उस वक्त देश का सांस्कृतिक ग्रिड ही फेल था और बिजली गुल थी!

गाली का कॉपीराइट और संस्कारी सेंसर बोर्ड

वैसे, भारतीय राजनीति में गालियों और अपशब्दों का कॉपीराइट तो हमेशा से नेताओं के पास सुरक्षित रहा है। चुनावी रैलियों में जब विरोधी एक-दूसरे को ‘मूर्खों का सरदार’, ‘दीदी-ओ-दीदी’ या अन्य मधुर वचनों से नवाजते हैं, तब संस्कृति मंद-मंद मुस्कुराती है। लेकिन जब आम महिलाएं सड़क पर आकर अपने हकों के लिए चिल्लाने लगें और गुस्से में कुछ कड़े शब्दों का इस्तेमाल कर लें, तो वह अचानक ‘संस्कृति का पतन’ बन जाता है। राहुल गांधी को शायद यह बुनियादी अंतर समझ नहीं आ रहा कि सत्ता में बैठे लोगों के कान केवल अपनी तारीफ का संगीत सुनने के आदी हो चुके हैं, जनता की चीखें उन्हें शोर लगती हैं।

काक-वाणी का तीखा निष्कर्ष

आखिर में, बात घूम-फिरकर वहीं आ जाती है कि शॉक किसे लगा और क्यों लगा। एक तरफ प्रधानमंत्री हैं जो देश की महिलाओं को केवल ‘घर की लक्ष्मी’ के रूप में देखना चाहते हैं, भले ही वह लक्ष्मी सड़क पर आकर न्याय की गुहार लगा रही हो। दूसरी तरफ राहुल गांधी हैं, जिन्हें इस सांस्कृतिक सदमे में भी प्रधानमंत्री की पोल खोलने की बेहतरीन हेडलाइन मिल गई। काक-वाणी का तो यही मानना है कि जब तक हमारे नेताओं की संवेदनशील नसें इतनी नाजुक रहेंगी, तब तक जनता को राजनीति के इस थिएटर में मुफ्त का तमाशा और भरपूर ‘शॉक’ मिलता रहेगा।


संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें

कागा जी