सूखी टहनी का आँसू: पंचतंत्र की एक भावुक कहानी

एक अनोखा रिश्ता: चीकू और बूढ़ा बरगद

एक घने जंगल में एक विशाल बरगद का पेड़ था। वह बरगद सदियों पुराना था और उसने न जाने कितने मौसम देखे थे। उस पेड़ की सबसे ऊंची डाली पर चीकू नाम की एक छोटी सी गौरैया रहती थी। चीकू बहुत चुलबुली और दयालु थी। जब भी जंगल में तेज तूफान आता, बरगद अपनी मजबूत शाखों से चीकू के घोंसले को ढक लेता और उसे आंच भी नहीं आने देता था। चीकू के लिए वह बरगद सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि उसका रक्षक और पिता समान था। दोनों का रिश्ता बहुत गहरा और अटूट था।

जब आया संकट का समय

समय बदला और उस साल जंगल में भीषण सूखा पड़ा। नदियां, तालाब और झरने सब सूख गए। पानी की बूंद-बूंद के लिए हाहाकार मच गया। पानी न मिलने के कारण बरगद की पत्तियां पीली पड़कर गिरने लगीं। उसकी टहनियां कमजोर होकर सूखने लगीं। जंगल के दूसरे पक्षी जो उस पेड़ पर बसेरा करते थे, वे अपनी जान बचाने के लिए दूसरे हरे-भरे जंगलों की ओर उड़ गए। बरगद अब बिल्कुल अकेला, बेजान और उदास खड़ा था।

चीकू ने अपने सभी साथियों को जाते देखा, लेकिन उसने बरगद का साथ छोड़ने से साफ इनकार कर दिया। बरगद ने कमजोर आवाज में कहा, “चीकू बेटी, तुम भी यहाँ से चली जाओ। मैं अब सूख चुका हूँ। मैं तुम्हें अब न तो छांव दे सकता हूँ और न ही आंधी-तूफान से बचा सकता हूँ। मेरी मौत निश्चित है, पर तुम अपनी जान बचा लो।”

सच्ची मित्रता और समर्पण

बरगद की बातें सुनकर चीकू की आँखों में आँसू आ गए। उसने रोते हुए कहा, “पिताजी, जब मैं कमजोर थी, तब आपने मुझे अपनी बाहों में समेटकर हर मुसीबत से बचाया। आज जब आप पर संकट आया है, तो मैं अपने स्वार्थ के लिए आपको अकेला कैसे छोड़ दूँ? सुख के तो सब साथी होते हैं, पर सच्चा मित्र वही है जो दुख में साथ निभाए।”

चीकू ने हार नहीं मानी। वह हर दिन मीलों दूर बहने वाली एक छोटी सी नदी के पास जाती और अपनी छोटी सी चोंच में पानी की कुछ बूंदें भरकर लाती। वह उन बूंदों को लाकर बरगद की सूखी जड़ों पर डाल देती। यह काम बहुत कठिन था और चीकू थककर चूर हो जाती थी, लेकिन उसके इरादे अडिग थे। उसकी चोंच से गिरने वाली हर बूंद में बरगद के प्रति उसका असीम प्रेम और समर्पण छिपा था।

श्रद्धा का फल और सीख

चीकू की इस निस्वार्थ सेवा, भक्ति और प्रेम को देखकर आसमान में तैरते बादल और देवराज इंद्र का हृदय भी पसीज गया। चीकू के अटूट विश्वास का मान रखने के लिए इंद्रदेव ने उस सूखे जंगल में अमृत रूपी मूसलाधार वर्षा कर दी। देखते ही देखते सूखी धरती हरी-भरी हो गई। बूढ़े बरगद की जड़ों को नया जीवन मिला और उसकी टहनियों पर फिर से हरे-भरे, कोमल पत्ते मुस्कुराने लगे। बरगद फिर से हरा-भरा हो गया और उसने चीकू को गले से लगा लिया।

कहानी की सीख

इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि संकट के समय अपनों और मित्रों का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। विपत्ति के समय धैर्य, निष्ठा और वफादारी बनाए रखना ही सच्ची मानवता और सच्ची मित्रता की पहचान है। जो लोग कठिन समय में अपनों का साथ निभाते हैं, ईश्वर भी उनकी मदद जरूर करता है।

कागा जी